स्वामी महावीर का जीवन परिचय और इतिहास।

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स्वामी महावीर का जीवन परिचय

स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। उन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनका जन्म 599 ईसा पूर्व में वैशाली बिहार के निकट कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्मतिथि 540 ईसा पूर्व मानते हैं। स्वामी महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ था और वह क्षत्रिय कबीले जन तंत्रिका के प्रधान थे। उनकी माता जी का नाम त्रिशला था। वह भी लिच्छवी वंश के शासक के चेटक की बहन थी।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

जैन साहित्य में इस बात का वर्णन आता है कि स्वामी महावीर के जन्म से पहले उनकी माता त्रिशला ने एक रात को चोदह श्रेष्ठ सपने देखें। उसने इन सपनों के बारे में अपने पति को बतलाया।

उसने राज्य के प्रसिद्ध ज्योतिषियों से इन सपनों के बारे में पूछा। इन ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की कि शीघ्र ही राजा के घर एक ऐसे बालक का जन्म होगा। जो बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा या महान तपस्वी। जिस समय स्वामी महावीर का जन्म हुआ तो उस समय आकाश में चारों ओर दिव्य प्रकाश हुआ। क्योंकि उस समय उनके पिता का राज्य अपनी उन्नति के शिखर पर था, इसलिए नवजात बालक का नाम वर्धमान (समृद्धि) रखा गया।



 

स्वामी महावीर का बाल्यकाल

वर्धमान का बचपन ए शाही शान-शौकत में व्यतीत हुआ। उन्हें सभी प्रकार की शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किए गए‌। जैन साहित्य में इस बात के अनेक विवरण मिलते हैं कि वर्धमान बचपन से ही बहुत वीर थे। एक बार उन्होंने एक विशाल अजगर को जिसने उनके एक साथी पर आक्रमण कर दिया था को नियंत्रण में किया।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

एक बार उन्होंने पागल हाथी को अपने वश में किया जिसने उनके अनेक मित्रों जो उस समय खेल रहे थे पर जोरदार धावा बोल दिया था तथा अन्य अनेक बहादुरी के कारनामों के कारण वर्धमान का नाम महावीर पड़ा। स्वामी महावीर बचपन से ही बहुत चिंतनशील थे। वह सत्य तथा मोक्ष के संबंध में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे।

 

स्वामी महावीर का विवाह

महावीर को अध्यात्मिक कार्यों में मग्न देखकर उनके पिता को चिंता होने लगी। वह उसे एक चक्रवर्ती सम्राट के रूप में देखना चाहते थे। महावीर का ध्यान सांसारिक कार्यों में लगाने के लिए उनका विवाह यशोदा नामक एक सुंदर राजकुमारी से कर दिया गया। विवाह के समय महावीर जी की आयु क्या थी इस संबंध में हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय के बाद महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम प्रियदर्शना अथवा अनोजा रखा गया।

 

स्वामी महावीर के त्याग तथा ज्ञान प्राप्ति

गृहस्थ जीवन भी स्वामी महावीर जी की धार्मिक रुचियों में किसी प्रकार की बाधा न बन सका। वास्तव में वह घर त्याग करने के बारे में अपना मन पहले ही बना चुका था। किंतु वह ऐसा करके अपने माता पिता के लिए किसी प्रकार भी दुख का कारण नहीं बनना चाहते थे। जब स्वामी महावीर की आयु 30 वर्ष की हुई तो उनके माता पिता की मृत्यु हो चुकी थी। अतः स्वामी महावीर ने अपने बड़े भाई नंदीवर्धन से आज्ञा लेकर गृहस्थी का त्याग कर दिया।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

गृहस्थ त्यागने के बाद स्वामी महावीर ने 12 वर्षों तक ज्ञान की प्राप्ति के उद्देश्य से कठोर तपस्या की। 1 वर्ष के बाद उन्होंने अपने वस्त्र उतार दिए तथा वह नग्न रहने लगे। उन्होंने अपने शरीर को अनेक प्रकार के कष्ट दिए। वे गर्मियों में धूप में तथा सर्दी में छाया में तप करते थे। स्वामी महावीर जी महीनों तक पानी नहीं पीते थे तथा अनेक दिनों के बाद कुछ भोजन खाते थे।

लोग उन्हें पागल समझकर उनका उपहास उड़ाते थे। बच्चे उन पर शोर मचाते तथा पत्थर मारते थे। इन कष्टों के बावजूद महावीर ने अपना धैर्य ने छोड़ा। यहां तक कि वह अपने घाव पर किसी प्रकार की औषधि का प्रयोग नहीं करते थे। अंत में उन्हें ऋजुपालिका नदी के तट पर एक शाल वृक्ष के नीचे जोकि जरिमबिक ग्राम में था कैवल्य ज्ञान (सर्वौच ज्ञान) की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर की आयु 42 वर्ष थी।



 

स्वामी महावीर और जैन धर्म

स्वामी महावीर जी को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वह जैन धर्म के 24वें तीर्थकर थे। उनसे पूर्व 23 तीर्थकर और हुए थे। प्रथम तीर्थकर का नाम ऋषभ देव तथा 23वें तीर्थकर का नाम पार्श्वनाथ था। जैन धर्म को आरंभ में निर्ग्रंथ का नाम दिया गया था। निर्ग्रंथ का शाब्दिक अर्थ है- सांसारिक बंधनों से मुक्ति। जैन धर्म ने त्रिरतन, अहिंसा, कठोर तप, कर्म सिद्धांत तथा आपसी भाईचारे का प्रचार किया।

 

जैन धर्म का प्रचार

ज्ञान प्राप्ति के बाद वर्धमान जो अब स्वामी महावीर कहलाने लगे ने लोगों में फैले अंधकार को दूर करने तथा उन्हें ज्ञान का नया प्रकाश दिखाने के उद्देश्य से अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया। उन्होंने अपना सर्वप्रथम उपदेश मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह में स्थित विपुल पर्वत पर दिया। इसके बाद उन्होंने 30 वर्षों तक भारत के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। उनकी मधुर वाणी तथा विचारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई बन गए।

 

जैन धर्म के प्रसार में स्वामी महावीर के व्यक्तित्व का प्रमुख योगदान था। उनका व्यक्तित्व मधुर वाणी, सहनशीलता, दया, कठोर तप, त्याग का सजीव उदाहरण था। उनके इन चारित्रिक गुणों ने लोगों के मनों पर जादुई प्रभाव डाला। उन्होंने जिस बात का भी प्रचार किया उसी पहले खुद अपनाया। उन्होंने अपने शाही ऐश्वर्या सुंदर पत्नी तथा पुत्री आदि का त्याग कर तथा 12 वर्षों तक कठोर तपस्या करके लोगों के सम्मुख एक नया उदाहरण प्रस्तुत की।

 

अतः बड़ी संख्या में लोगों ने जैन धर्म में सम्मिलित होना शुरू कर दिया। स्वामी महावीर जी के विख्यात प्रचार केंद्रों के नाम यह थे- राजगृह, वैशाली, कोसल, कोसांबी, अवंती, चम्पा, मिथिला, विदेह तथा अंग।

 

स्वामी महावीर का निर्वाण

स्वामी महावीर ने 72 वर्ष की आयु में 527 ईसा पूर्व में पावा (पटना) में निर्वान (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14000 अनुयाई थे।



 

स्वामी महावीर जी की शिक्षाएं

 

1. त्रिरत्न:- स्वामी महावीर जी के अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को त्रिरत्न का पालन करना अति आवश्यक है। ये त्रिरत्न है- 1. सत्य विश्वास 2. सत्य ज्ञान 3. सत्य आचरण
यह तीनों रत्न साथ साथ चलते हैं। इनमें से अगर एक की भी कमी हो तो व्यक्ति अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता।

 

2. अहिंसा:- स्वामी महावीर ने अहिंसा पर जितना बल दिया है, उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अहिंसा का अर्थ है- किसी जीव की हत्या न करना अथवा उसे किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचाना।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

स्वामी महावीर का विचार था कि मनुष्य के अतिरिक्त पशु-पक्षियों तथा पेड़ पौधों आदि में भी आत्मा का निवास होता है। इसलिए हमें किसी भी जीव तथा निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसलिए जैन साधु नंगे पांव चलते हैं। मुंह पर पट्टी बांधते हैं और पानी छानकर पीते हैं ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाए।

 

3. कर्म सिद्धांत:- स्वामी महावीर जी ने कर्म सिद्धांत को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। इस सिद्धांत के अनुसार जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बोओगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे कर्म करोगे तो अच्छा फल मिलेगा बुरा करोगे तो बुरा होगा। किसी भी हालात में कर्म से छुटकारा मिलने वाला नहीं है‌। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है।

 

3. कठोर तप:- स्वामी महावीर जी ने कठोर तप को काफी महत्वपूर्ण माना है। कठोर तप द्वारा ही मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है तथा वह निर्वाण को प्राप्त कर सकता है। स्वामी महावीर ने समय 12 वर्षों तक कठोर तप करने के बाद ही सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया था। इन वर्षों के दौरान वह भूखे प्यासे तथा नग्न रहे और अपने शरीर को घोर कष्ट दिए। उन्होंने अपने शिष्यों को भी यही उपदेश दिया।

 

4. समानता में विश्वास: स्वामी महावीर समानता के सिद्धांत पर विश्वास रखते थे। स्वामी महावीर के अनुसार सभी मनुष्य समान है इसलिए मनुष्य को अमीर गरीब और जात-पात का भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्वामी महावीर ने जैन धर्म के द्वार स्त्रियों के लिए भी खोल दिए। इस प्रकार उन्होंने पुरुषों तथा स्त्रियों की समानता का प्रचार किया।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

5. ईश्वर में अविश्वास:- स्वामी महावीर जी ईश्वर के अस्तित्व में बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे। वह ईश्वर को सृष्टि का रचयिता नहीं समझते थे। स्वामी महावीर जी का कहना है कि निर्माणकर्ता के हाथ पैर होते हैं तथा वह अपने हाथों से काम करके किसी वस्तु का निर्माण करता है, क्योंकि ईश्वर निराकार है अथवा जिसका कोई रूप नहीं है वह सृष्टि का रचयिता नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्य अपने भाग्य का समय विधाता है। अतः उसे निर्वाण प्राप्ति के लिए ईश्वर की सहायता की आवश्यकता नहीं है।

 

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