सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता क्या थी?

 7,549 total views,  1 views today




सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता क्या थी?

 

सिंधु घाटी सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता थी। इस सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास के एक नए युग का श्रीगणेश किया। इस सभ्यता की सर्वप्रथम 1921 ईस्वी में श्री दयाराम साहनी ने हड़प्पा के स्थान पर खोज की। यह सभ्यता एक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी। इस सभ्यता के पाकिस्तान में प्रमुख केंद्र हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो तथा सुतकागेनदोर थी। भारत में इस सभ्यता के प्रमुख केंद्र कोटला निहंग खां, संघोल, मीताथल, बनावली, कालीबंगन, आलमगीरपुर, लोथल तथा रंगपुर थे।

 

सिंधु घाटी सभ्यता की नगर योजना बहुत उच्च कोटि की थी। इस सभ्यता के भवन पक्की ईंटों के बने हुए थे तथा उन्हें एक निश्चित योजनाओं के अनुसार बनाया जाता था। आवागमन के लिए सड़कों की उत्तम व्यवस्था थी। नगर से जल के निकास के लिए नालियों का प्रबंध इतना अच्छा था कि ऐसा उदाहरण प्राचीन काल के किसी अन्य देश में नहीं मिलता। हड़प्पा का समाज जाति-पाति पर आधारित नहीं था। समाज में स्त्रियों को विशेष सम्मान प्राप्त था। उस समाज की स्त्रियां आधुनिक काल की स्त्रियों की तरह हार-श्रृंगार की बहुत शौकीन थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मातृदेवी की सर्वाधिक पूजा करते थे। इसके अतिरिक्त वे शिव, पशु पक्षियों, वृक्षों, लिंग तथा योनि, जल तथा सूर्य आदि की भी उपासना करते थे। हड़प्पा निवासी जादू टोने में विश्वास रखते थे। उनका आर्थिक जीवन भी बहुत सम्रद्ध था। कृषि, पशु पालन, उद्योग तथा व्यापार उनके आर्थिक जीवन के मुख्य आधार थे। हड़प्पा सभ्यता जो की एक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी की उत्तम व्यवस्था इस बात का संकेत है कि उस समय की सरकार ने लोगों को अच्छा प्रशासन दिया था। हड़प्पा सभ्यता के लोग मुहरें बनाने में निपुण थे।

 

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज।

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज की कहानी अत्यंत मनोरंजक है। बात 1856 ईस्वी की है। उस समय जान ब्रण्टन नामक एक अंग्रेज की अध्यक्षता में भारत सरकार कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बनवा रही थी। इस कार्य के लिए इंजीनियरों को अच्छे पत्थरों की आवश्यकता थी। इन पत्थरों की खोज करते हुए उन्होंने हड़प्पा के पास एक बहुत बड़ा टीला देखा। अतः ब्रण्टन ने यहां से पत्थर प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक मजदूरों को कार्य पर लगा दिया। इन मजदूरों को यहां से कुछ ऐसी चीजें प्राप्त हुई जिन पर कुछ चित्र बने हुए थे। किंतु इन ईंटों का रहस्य बना रहा। 1873 ईस्वी में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक मेजर जनरल अलैग्जेंडर कनिंघम को मोहनजोदड़ो से एक मुहर प्राप्त हुई इस पर लिखी लिपि को न पढ़ें जा सकने के कारण हड़प्पा सभ्यता का रहस्य पूर्व की भांति बना रहा।

 

1921 ईस्वी में आर० बी० दयाराम साहनी ने हड़प्पा की खुदाई करके हड़प्पा सभ्यता पर प्रकाश डाला। निसंदेह इसने भारतीय इतिहास में एक नए युग का श्रीगणेश किया। 1922 ईस्वी में पुरातत्व विभाग के एक अन्य विद्वान आर० डी० बनर्जी ने मोहनजोदड़ो नामक स्थान से एक बौद्ध स्तूप को खोज निकाला। उसने बौद्ध धर्म के अन्य अवशेषों को प्राप्त करने के उद्देश्य से वहां खुदाई शुरू करवा दी। इस खुदाई के दौरान उसे हड़प्पा से प्राप्त की गई मोहरें तथा बर्तन आदि प्राप्त हुए। इन उपलब्धियों की सूचना भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल को दी गई। उसने अपने निर्देशन में इन दोनों स्थलों की बड़े पैमाने पर खुदाई का कार्य शुरू करवा दिया। इन प्रयासों के परिणाम स्वरुप सिंधु घाटी की सभ्यता प्रकाश में आई।



 

सिंधु घाटी सभ्यता के विभिन्न नाम।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता को यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इस सभ्यता के आरंभिक केंद्र सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में मिले हैं। इसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस सभ्यता के सर्वप्रथम चिन्ह हड़प्पा नामक स्थान से मिले हैं। यह सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता के नाम से जानी जाती हैं, क्योंकि इस सभ्यता के लोग बर्तन, मूर्तियां तथा औजार बनाने के लिए कांसे का प्रयोग प्रमुख रूप से करते थे।

 

सिंधु घाटी सभ्यता का काल।

सिंधु घाटी सभ्यता के काल का प्रश्न भी विवाद का एक विषय है। विभिन्न विद्वानों ने इस सभ्यता के काल की विभिन्न तिथियां बताई है। एच० हेरास ने नक्षत्रीय आधार पर इसका काल 5600 ई० पूर्व माना है। सर जॉन मार्शल ने हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों तथा मिश्र एवं मेसोपोटामिया की सभ्यताओं का अध्ययन करते हुए इस सभ्यता का काल 4000-2500 ईसा पूर्व तक माना है। सी० एल० फाबरी ने इस सभ्यता का काल 2800-2500 ई० पूर्व निश्चित किया है। सर मोर्टीमर व्हीलर के विचार अनुसार यह सभ्यता 2500-1700 ई० पूर्व के मध्य विकसित हुई।

 

हड़प्पा सभ्यता के मिले अवशेषों की रेडियो कार्बन विधि द्वारा इस सभ्यता का काल ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है अधिकांश इतिहासकार हड़प्पा सभ्यता का काल 2300-1750 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है। अधिकांश इतिहासकार हड़प्पा सभ्यता का काल 2250-1750 ईसा पूर्व मानते हैं‌। इस आधार पर कहा जा सकता है कि हड़प्पा सभ्यता लगभग 5000 वर्ष पुरानी थी ‌

 

सिंधु घाटी सभ्यता की संस्थापक कौन थे?

सिंधु घाटी सभ्यता के संस्थापक कौन थे? यह भी एक विवाद का विषय है विभिन्न विद्वानों ने इस विषय पर अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए हैं। अनेक भारतीय विद्वानों का यह कथन है कि हड़प्पा सभ्यता की स्थापना द्राविड़ो द्वारा की गई थी। द्राविड़ हड़प्पा के निवासी थे। कुछ अन्य विद्वानों का यह विचार है कि इस सभ्यता के संस्थापक आर्य थी। इस मत को इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि हड़प्पा सभ्यता तथा वैदिक सभ्यता में बहुत अंतर था। कुछ पश्चिमी विद्वानों ने यह मत प्रस्तुत किए है कि इस सभ्यता की स्थापना सुमेरियन लोगों ने की थी। इस विचार को भी अनेक विद्वानों ने दोनों सभ्यताओं में पाई जाने वाली भिन्नता के आधार पर अस्वीकार कर दिया।

 

वास्तव में हड़प्पा की विभिन्न केंद्रों में की गई खुदाई से अस्थि-पंजर प्राप्त हुए हैं, उनके अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है हड़प्पा सभ्यता के लोग अनेक जातियों से संबंधित थे। इन जातियों को मुख्य चार भागों में बांटा जा सकता है इनके नाम है-

 

1. प्रोटो-आस्ट्रोलायड 2. भूमध्य सागरीय 3. मंगोलियन तथा 4.अल्पाइन। इन विभिन्न जातियों ने ही हड़प्पा सभ्यता के निर्माण में बहुमूल्य योगदान दिया।

 

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख केंद्र।

सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान तथा भारत की एक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी। इस सभ्यता के लगभग 300 केंद्रों की खोज की जा चुकी है। इन केंद्रों में अधिक खोज का कार्य अभी भी जारी है। दोस्तों अब मैं आपको बताने वाला हूं, सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख केंद्रों के बारे में।

 

1. हड़प्पा:- हड़प्पा पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान के मिण्टगुमरी जिले में रावी नदी के किनारे पर स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का प्रथम नगर था जिसकी खोज 1921 ईस्वी में आर० बी० दयाराम साहनी ने की थी। इस नगर की खुदाई के कार्य में सर जॉन मार्शल, सर मोर्टीमर व्हीलर, एम० एस० वत्स ने प्रशंसनीय योगदान दिया।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

यह हड़प्पा सभ्यता से मिलने वाले नगरों में सबसे विशाल था। यह 5 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इस नगर की छह सतह मिली है। इससे यह विश्वास किया जाता है कि यह नगर 6 बार बना तथा नष्ट हुआ था। यह नगर आधुनिक ढंग से बना हुआ था। इसके मकान पक्के तथा सड़के और गलियां चोड़ी थी। इस नगर से हमें हड़प्पा सभ्यता का सबसे विशाल अन्नागार जिसका क्षेत्रफल 169×135 था। इस नगर की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक विशाल दीवार का निर्माण किया गया था।

 

2. मोहनजोदड़ो:- मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का दूसरा विशाल और महत्वपूर्ण नगर था। यह सिंध के लरकाना जिले में स्थित है। मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है मृतकों का टीला। नगर की खोज 1922 ईस्वी में आर डी बनर्जी ने की थी। यह नगर सिंधु नदी के किनारे पर स्थित था। यह हड़प्पा से 483 किलोमीटर दूर था। यह नगर लगभग 4 किलोमीटर के घेरे में फैला हुआ था‌ इस नगर की रचना भी हड़प्पा की तरह थी। यहां के मकान भी योजनाबद्ध ढंग से बनाए गए थे‌। यहां की सड़के तथा नालियां चौड़ियां थी। जल निकासी के लिए नालियों की उत्तम व्यवस्था थी। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह नगर सात बार बसा तथा नष्ट हुआ था।

 

3. चन्हूदड़ों:- यह नगर सिंध (पाकिस्तान) में मोहनजोदड़ो से लगभग 130 किलोमीटर दूर स्थित है। इसकी खोज 1931 में एन० जी० मजूमदार ने की थी। इस नगर की खुदाई का कार्य 1935-36 ईसवी में किया गया। इस नगर की 2 परतें मिली है, जिसे यह पता चलता है कि यह दो बार बना और नष्ट हुआ था। यह नगर मटके बनाने के लिए प्रसिद्ध था। इस नगर से हमें बहुत से तांबे और कांस्य से निर्मित औजार भी प्राप्त हुए हैं। श्रीनगर की निर्माण योजना हड़प्पा नगर से मिलती-जुलती थी।

 

4. सुतकागेंदोर:- यह नगर बलोचिस्तान (पाकिस्तान) में अरब सागर के किनारे स्थित है। यह स्थल कराची से लगभग 480 किलोमीटर दूर स्थित है। इस नगर की खोज 1931 ईस्वी में सर ओरल स्टाईन ने की थी। इस नगर की अधिक खुदाई का कार्य सर जार्ज डेल्स के नेतृत्व में हुआ। यहां से एक बंदरगाह भी मिली है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यहां हड़प्पा सभ्यता तथा बेबीलोन के मध्य है समुद्री व्यापार होता था।

 

5. कोटला निहंग खां: यह स्थान पूर्वी पंजाब के रोपड़ जिले में सतलुज नदी के बाएं तट पर स्थित है। इस नगर की खोज 1953 ईस्वी में श्री यज्ञदत्त शर्मा ने की थी। इस नगर का छ: बार निर्माण और विनाश हुआ है। यहां के मकान पत्थर और मिट्टी के बने हुए हैं। यहां एक कब्रिस्तान में मिला है जो लोगों के निवास स्थान से कुछ दूरी पर स्थित था। यहां के आभूषण और मिट्टी हड़प्पा के अनुरूप है। यहां से एक मुहर तथा तांबे की कुल्हाड़ी भी मिली है।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

6. संघोल:- यह नगर पूर्वी पंजाब के लुधियाना जिले में स्थित है। इस नगर की खोज 1968 ईस्वी में एस० एस० तलवार तथा आर० एस० बिष्ट ने की थी। यह नगर 6 बार बसा तथा उजड़ा था। यहां से मिले बर्तन, मूर्तियां तथा अन्य अवशेष हड़प्पा नगर से मिलते-जुलते हैं। इस नगर के चारों ओर एक खाई थी जो सदैव जल से भरी रहती थी। इससे नगर की शत्रुओं से रक्षा के लिए बनाया गया था।

 

7. मीताथल:- यह नगर हरियाणा के भिवानी जिले में स्थित है‌। इस नगर की खोज 1968 ईस्वी में श्री सूरजभान ने की थी। इस नगर को सुव्यवस्थित ढंग से बनाया गया था। यहां की सड़के, गलियां, खिलौने, मूर्तियां, आभूषण तथा बर्तन हड़प्पा नगर के अनुरूप थे।

 

8. बनावली:- बनावली नगर हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। इस नगर की खोज 1973 ईस्वी में आर० एस० बिष्ट ने की थी। यह नगर सुनियोजित ढंग से बनाया गया था। यहां से प्राप्त बर्तन, मूर्तियां तथा आभूषण इत्यादि हड़प्पा संस्कृति के अनुरूप थे।

 

9. कालीबंगन:- यह केंद्र राजस्थान प्रांत के जिला गंगानगर में स्थित है। इस नगर का नाम यहां पर बनने वाली चूड़ियों के कारण पड़ा। इस नगर की खोज 1953 ईस्वी में ए० घोष ने की थी। बाद में बी० के० थापर और बी० बी० लाल ने यहां पर खुदाई के काम को जारी रखा। इस नगर की निर्माण योजना हड़प्पा नगर की निर्माण योजना जैसी ही है। यहां से हमें हड़प्पा संस्कृति के बहुत से बर्तन, आभूषण और खिलौने मिले हैं।

 

10. आलमगीरपुर:- यह नगर उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में स्थित है। इस नगर की खोज 1958 ईस्वी में यज्ञदत्त शर्मा ने की थी‌। यहां से हमें हड़प्पा संस्कृति के आभूषण, मूर्तियां तथा बर्तन मिले हैं। यहां के मकान पक्की ईंटों के बने हुए थे। यहां के लोग बारीक कपड़ा बुनना जानते थे। आलमगीरपुर चार बार बसा तथा नष्ट हुआ था।



11. लोथल:- यह नगर गुजरात प्रांत के जिला अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर स्थित था। इस स्थल की खोज 1954 ईस्वी में एस० आर० राव ने की थी। उसके नेतृत्व में यहां खुदाई का कार्य 1955 ईस्वी से 1960 ईस्वी तक चलता रहा। इस नगर के छह बार बसने तथा नष्ट होने के चिन्ह मिले हैं। इस नगर को नदी की बाढ़ से बचाने के लिए उचित चबूतरे पर बनाया गया था। यह नगर 3 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ था। इस नगर में एक विशाल बंदरगाह थी। इस बंदरगाह से पश्चिमी एशिया के देशों के साथ व्यापार चलता था। इसके अतिरिक्त यहां से मनके बनाने का उद्योग भी प्रकाश में आया है। यहां से हमें अनेक प्रकार के बर्तन, मूर्त्तियां, खिलौने, आभूषण तथा हाथी दांत से निर्मित वस्तुएं प्राप्त हुई है।

 

12. रंगपुर:- यह नगर गुजरात में लोथल से केवल 50 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है। इस नगर की खोज 1957-58 ईस्वी में एस० आर० राव ने की थी। बाढ़ के कारण लोथल नगर का विनाश हो गया था तो लोगों ने वहां से भागकर रंगपुर बस्ती बसाई थी। यहां के भवन, नालियां, बर्तन, आभूषण तथा इतिहास आदि हड़प्पा नगर जैसे थे।

 

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार।

हड़प्पा सभ्यता के केंद्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह सभ्यता पाकिस्तान के सिंधु, पश्चिमोत्तर सीमा प्रदेश, पंजाब और बलोचिस्तान तथा भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और गुजरात के क्षेत्रों में फैली हुई थी। इस प्रकार इस सभ्यता की कुल सीमा 1,99,600 वर्ग किलोमीटर थी।

 

सिंधु सभ्यता की नगर निर्माण योजना।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता निश्चित रूप से एक उच्च कोटि के नगरीय सभ्यता थी। खुदाई से मिले हड़प्पा मोहनजोदड़ो तथा अन्य नगर को देखकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता निवासियों के नगर विशेष योजना अनुसार तथा बड़े वैज्ञानिक ढंग से बनाए जाते थे।

 

1. नागरिकों के निवास स्थान:- हड़प्पा सभ्यता के लोग भवन निर्माण कला में बहुत निपुण थे। इन भवनों की प्रमुख विशेषता यह थी कि इन्हें एक निश्चित योजना के अंतर्गत बनाया जाता था। प्रत्येक मकान के पीछे खुला आंगन होता था। जिसके चारों ओर छोटे बड़े कमरे बनाए जाते थे। इन मकानों को बाढ़ से सुरक्षा के लिए उन्हें उचित चबूतरे पर बनाया जाता था। तथा मकान की नींव भी काफी गहरी रखी जाती थी। मकानों के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग किया जाता था। मकान की दीवार काफी मोटी होती थी। दीवारों की सुंदरता मजबूती के लिए इन पर मिट्टी का लेप कर दिया जाता था। मकान की छत में लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। मकान के फर्स भी पक्की ईंटों से बनाए जाते थे।

 

प्रत्येक मकान में हवा तथा प्रकाश के प्रवेश के लिए दरवाजे खिड़कियां तथा रोशनदान बनाए जाते थे। यह लकड़ी के बनाए जाते थे। मकानों के दरवाजे तथा खिड़कियां मुख्य रूप से सड़क की तरफ ने खुलकर गली की ओर खुलती थे। ऐसा सड़क पर अधिक भीड़ इकट्ठी न होने देने के उद्देश्य से किया गया था। प्रत्येक मकान में रसोई घर शौचालय और स्नानागार का उचित प्रबंध था। अधिकांश मकानों में कुएं भी होते थे। घरों में वर्षा और गंदे पानी के निकास के लिए नालियों का उत्तम प्रबंध था। कुछ मकान दो या दो से अधिक मंजिलों के बने हुए थे।

 

इन मकानों में ऊपर जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां बनी हुई थी। धनी लोगों के मकान 2 मंजिल के होते थे, इनमें अनेक तथा बड़े कमरे होते थे। जनसाधारण के मकान 1 मंजिल के होते थे, इनमें छोटे कमरे होते थे। कुछ ऐसे मकान के प्रकाश में आए हैं जिनका निर्माण अलग से किया गया था। यह मकान बहुत छोटे थे, हो सकता है कि ये मजदूरों तथा गुलामों के भवन थे।



 

2. सावर्जनिक भवन:- हड़प्पा की खुदाई के दौरान हमें कुछ सार्वजनिक भवनों के अवशेष मिले हैं।

 

क) विशाल स्नानागार:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से मिलने वाला सबसे विख्यात भवन मोहनजोदड़ो स्थित विशाल स्नानागार था। आश्चर्य की बात है कि आज से लगभग 5000 वर्ष पहले हड़प्पा निवासियों ने इतना विशाल स्नानागार किस प्रकार बनाया? यह स्नानागार 180 फुट लंबा तथा 108 फुट चौड़ा है। इसके मध्य 39 फुट लंबा, 23 फुट चौड़ा, 8 फुट गहरा तालाब बना हुआ था। तालाब की दीवारें तथा फर्श पक्की ईंटों के बनाए गए थे। इसमें प्रवेश करने के लिए उत्तरी तथा दक्षिणी छोरों ऊपर ईटों की सीढ़ियां बनाई गई थी। इस तालाब के निकट एक कुआं था जिससे इस तालाब में पानी भरा जाता था। इस तालाब के गंदे पानी के निकास के लिए अलग नालियों का प्रबंध किया गया था। इस तालाब के चारों ओर बरामदे बने हुए थे इन बरमादो के नीचे दो मंजिला कमरे थे।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

ख) अन्नागार:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल तथा कालीबंगा आदि से अनेक अन्नागारों का पता चला है। अन्नागारों में अनाज को सरकार द्वारा सुरक्षित रखा जाता था। ताकि प्राकृतिक आपदा के समय सरकार यहां से जनता को अनाज बांट सके। हड़प्पा का अन्नागार सबसे विशाल था। यह 169 फीट लंबा तथा 135 फुट चौड़ा था। यह रावी नदी के निकट ही स्थित था। इससे स्पष्ट है कि यहां नदी द्वारा अनाज लाया जाता होगा। दूसरा विशाल अन्नागार मोहनजोदड़ो में था। यह 150 फुट लंबा तथा 75 फुट चौड़ा था। यह भी सिंधु नदी के निकट ही स्थित था।

 

ग) अन्य भवन- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से विभिन्न प्रकार के अन्य भवन भी प्रकाश में आए हैं। इनमें मौजूद स्थित एक विशाल भवन जो 230 फुट लंबा तथा 78 फुट चौड़ा तथा यहीं से प्राप्त हुआ 20 स्तम्भों वाला विशाल हाल जो 90 फुट लंबा और 90 फुट ही चौड़ा था। उल्लेखनीय है यह शायद राज्य के किसी उच्च अधिकारी का निवास स्थान तथा सभागार था, जहां सभा के अधिवेशन होते थे। इनके अतिरिक्त हड़प्पा की खुदाई से ऐसे अनेक विश्राम गृहों का भी पता चला है जो यात्रियों की सुविधा के लिए बनाए गए थे।

 

3. सड़के:- हड़प्पा सभ्यता के लोग नगरों का निर्माण करते समय सड़कों के प्रबंध की ओर विशेष ध्यान देते थे। संपूर्ण नगर में छोटी बड़ी सड़कों का जाल बिछा हुआ था। प्रमुख सड़कें काफी चौड़ी होती थी। यह सड़के 30 फुट से लेकर 34 फुट तक होती थी। यह सभी सड़कें छोटी-छोटी उप सड़कों से जुड़ी होती थी‌। सड़कों के किनारों पर या तो कूड़ेदान रखे जाते थे या गड्ढे खोदे हुए होते थे जहां कूड़ा फेंका जाता था। सड़कों के किनारे ढालुआं बनाई जाती थी। ताकि वहां वर्षा का पानी न खड़ा हो सके। सड़को पर रोशनी का उचित प्रबंध था।

 

4. नालियों की व्यवस्था:- हमें यह जानकर बहुत आश्चर्य होता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने वर्षा तथा गंदे पानी के निकास के लिए नालियों की वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्था की हुई थी। प्रत्येक घर में छोटी नालियां होती थी, जो घरों के पानी को बाहर गली अथवा सड़क के किनारे बनी नालियों में लाकर गिराती थी। यह नालियां शहर के बाहर किसी बड़े नाले में जाकर गिरती थी। यह नालियां पक्की ईंटों से बनाई जाती थी। इन नालियों को इस प्रकार ढका जाता था कि सफाई करने के लिए उन्हें सुविधापूर्वक हटाया जा सकता था‌। इन नालियों में किसी को भी कूड़ा फेंकने की अनुमति नहीं थी‌। संक्षेप में कहा जायें तो ऐसी नालियों की व्यवस्था प्राचीन काल में किसी अन्य देश में नहीं मिलती।

 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का सामाजिक जीवन।

हड़प्पा सभ्यता की खुदाई से हमें जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उन के आधार पर तत्कालीन सामाजिक जीवन के रूपरेखा प्रस्तुत कर सकते हैं। निसंदेह सिंधु निवासियों का सामाजिक जीवन काफी उन्नत तथा सम्रद्ध था।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

1. परिवार:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों के समाज की मुख्य इकाई परिवार थी। उस समय परिवार संयुक्त होते थे अथवा एकल इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है। उस समय के विशाल भवनों को देखकर यह अनुमान लगाया गया है कि यहां बड़े परिवार रहते थे। प्रत्येक परिवार में माता-पिता, भाई-बहन तथा पुत्र पुत्रियां आदि रहते थे। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त बहु संख्या में स्त्रियों की मूर्तियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय का समाज मातृसत्तात्मक था। इसलिए भाव यह है कि समाज में स्त्रियों को प्रमुख स्थान दिया जाता था।



 

2. सामाजिक वर्गीकरण:- सिंधु घाटी सभ्यता का समाज कितने वर्गों में विभाजित था इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है। सम्भत: उस समय का समाज चार वर्गों में विभाजित था। ये वर्ग थे– शासक वर्ग, धनी वर्ग, मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग। शासक वर्ग में शासक तथा पुरोहित, धनी वर्ग में योद्धा, व्यापारी तथा कारीगर, मध्यम वर्ग में कृषक छोटे व्यापारी तथा चिकित्सक तथा निम्न वर्ग में मजदूर चरवाहे तथा गुलाम सम्मिलित थे। शासक तथा धनी वर्ग सुखी एवम संपन्न जीवन व्यतीत करते थे। वे दुर्गो तथा विशाल भवनों में रहते थे। मध्यम वर्ग के निवास अपेक्षाकृत कुछ छोटे थे। निम्नवर्ग झोपड़ियों में रहता था, उनकी दशा संतोषजनक नहीं थी। यह वर्ग विभाजन आर्थिक व्यवसाय पर आधारित था न की जाति प्रथा पर।

 

3.भोजन:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग विभिन्न प्रकार का भोजन खाने के बहुत शौकीन थे। उनका मुख्य भोजन गेहूं, जौं तथा चावल था। इसके अतिरिक्त वे मटर फलियां अनेक प्रकार की दालों तथा नींबू का भी प्रयोग करते थे। वह दूध, दही, मक्खन, घी तथा मसालों का सेवन भी करते थे। वह खजूर नारियल अनार तथा केला आदि फल खाने की भी शौकीन थे। वे भेड़, बकरी, गाय, सूअर, हिरण, मुर्गे तथा मछली का मांस भी खाते थे। इस प्रकार सिंधु निवासी शाहकारी तथा मांसाहारी दोनों थे।

 

4. वस्त्र:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग किस प्रकार के वस्त्र पहनते थे? इस बात का अनुमान हम मूर्तियों की वेशभूषा से लगा सकते हैं। अधिकतर लोग सूती वस्त्र पहनते थे, धनी लोग ऊनी वस्त्रों का भी प्रयोग करते थे। स्त्रियों तथा पुरुषों के लिए वस्त्रों में कोई विशेष अंतर नहीं था। स्त्रियां निचले भाग में लहंगा डालती थी, तथा ऊपरी भाग में एक चादर का प्रयोग करती थी। वह सिर पर एक विशेष वस्त्र पहनती थी जो पंखे की तरह उठा होता था।

 

पुरुष नीचे के भाग के लिए धोती तथा ऊपरी भाग के लिए एक चादर अथवा शोल का प्रयोग करते थे। उस समय रंगीन एवं सादें दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग होता था। हड़प्पा की खुदाई से हमें अनेक तकले तथा सूइंया प्राप्त हुई है, जो इस बात का प्रमाण है कि उस समय के लोग सूत कातना अथवा कपड़ों को सीना जानते थे।

 

5. आभूषण:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को चाहे वह पुरुष हो या फिर महिला आभूषणों से बहुत लगाव था। शरीर का शायद ही कोई ऐसा अंग होगा जिसे वे अलंकृत ने करते हो। प्रमुख आभूषणों में हार चूड़ियां, कड़े, अंगूठी, बाजूबंद, नथनी, पाजेब तथा कानों की बालियां थी। धनी लोगों के आभूषण सोने, चांदी, मूल्यवान पत्थरों तथा हाथी के दांत के बने होते थे। गरीब लोगों के आभूषण तांबे तथा हड्डियों के बने होते थे।

 

6. हार श्रृंगार:- हड़प्पा सभ्यता के लोग हार श्रृंगार के बहुत शौकीन थे। स्त्रिया लंबे बाल रखने विभिन्न प्रकार के जूड़े अथवा चोटी बनाने की शौकीन थी। यह बालों को संवारने के लिए दर्पण कंघी तथा विभिन्न प्रकार के पिनों का प्रयोग करती थी‌। खुदाई के दौरान हमें तांबे के दर्पण तथा हाथी दांत की कघियां मिली हैं। इनके अतिरिक्त हमें अनेक श्रंगार दान भी मिले हैं, जो हाथी दांत से निर्मित होते थे। पुरुषों में दाढ़ी तथा मूंछ रखने का रिवाज था। कुछ पुरुष उन्हें साफ भी करवा देते थे। कुछ पुरुष पगड़ी बांधते थे, पुरुष भी अपनी आंखों को सुंदर बनाने के लिए काजल का प्रयोग करते थे।

 

7. मनोरंजन:- हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता के लोग बहुत आमोद प्रिय थे। वह अपने अवकाश के क्षणों में विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। वह शतरंज खेलने की बहुत शौकीन थे। शिकार करना, मछलियां पकड़ना, पशु पक्षियों को पालना तथा उन्हें आपस में लड़वाना भी सिंधु निवासियों के मनोरंजन के साधन थे। उस समय के लोगों को नृत्य और संगीत में विशेष रुचि थी। ढोल तथा वीणा उनके मुख्य वाद्ययंत्र थे। बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के पशु पक्षी, मानव आकृतियां, गाड़ियां, सीटियां तथा झुनझुने आदि नामक खिलौने तैयार किए जाते थे।

 

8. मृतकों का संस्कार:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों में शवों के विसर्जन की तीन प्रथाएं थी। प्रथम विधि के अनुसार शव को पूरी तरह जला दिया जाता था, जो राख बच जाती थी, उसे एक बर्तन में डाल कर दबा दिया जाता था। दूसरी विधि के अनुसार पुरे शव को जमीन में दफना दिया जाता था तथा तीसरी विधि के अनुसार शवों को कुछ समय के लिए किसी खुले स्थान पर रख दिया जाता था। पशु पक्षियों के खाने के बाद जब वह अस्ती पिंजर शेष रह जाता था तो उसे दफना दिया जाता था।

 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का धार्मिक जीवन।
सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

हड़प्पा सभ्यता के लोगों के धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालने के लिए हमें दो प्रमुख कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रथम, हड़प्पा की अब तक की गई खुदाई से हमें किसी ऐसे भवन का पता नहीं चला जो उनके मंदिर से संबंधित हो। दूसरा, अभी तक विद्वान हड़प्पा सभ्यता की लिपि को पढ़ने में सफल नहीं हुए हैं। इन कठिनाइयों के बावजूद हड़प्पा की खुदाई से मिली मुहरों, चित्र, तथा मूर्तियों आदि से हड़प्पा के लोगों के धार्मिक जीवन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

 

1. मातृदेवी की पूजा: हड़प्पा सभ्यता के लोग सर्वाधिक मातृदेवी की पूजा करते थे। ऐसा प्रमाण हमें हड़प्पा की खुदाई से मातृदेवी की अनेक मूर्तियां, मुहरों तथा ताबीजों पर अंकित उसके चित्रों से प्राप्त होता है। अनेक मूर्तियां पर धुएं के धब्बे हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस समय के लोग मातृदेवी की धूप दीप आदि से पूजा करते थे। एक मुहरों पर अंकित चित्र से अनुमान लगाया जाता है कि देवी को खुश करने के लिए नर बलि दी जाती थी मातृदेवी को शक्ति का प्रतीक समझा जाता था।

 

2. शिव की पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों में एक देवता की पूजा भी सर्वप्रिय थी। उस समय की प्राप्त कुछ मुहरों पर एक देवता के चित्र अंकित हैं। इनमें इस देवता को योगी की मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है। उसके तीन मुख है। उसके सिर पर त्रिशूल अंकित है, क्योंकि शिव को ही त्रिमुखी, पशुपति, योगेश्वर तथा त्रिशूलधारी आदि के नामों से जाना जाता है। इसलिए इतिहासकारों का विचार है कि यह योगी कोई और नहीं अपितु शिव ही है।

 

3. पशुओं की पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त होने वाले अनेक मुहरों तथा ताबीज आदि से इस बात का संकेत मिलता है कि उस समय के लोग अनेक प्रकार के पशुओं की पूजा करते थे। इन पशुओं में हाथी, बाघ, भैंस, बैल, गैंडा, हिरण मगरमच्छ आदि थे‌। इन पशुओं की पूजा विविध देवताओं के वाहन के रूप में अथवा स्वतन्त्र देवता के रूप में की जाती थी।

 

4. वृक्षों की पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वृक्षों की पूजा करते थे। वृक्षों को देवी देवताओं का आवास मानकर उनकी पूजा करते थे। वृक्षों को जीवन तथा ज्ञान देने वाले दाता समझते थे। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें जो मुहरें प्राप्त हुई है, उनमें सर्वाधिक पीपल वृक्ष के चित्र अंकित मिले हैं। अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पा सभ्यता निवासी पीपल को विशेष धार्मिक महत्व देते थे। इसके अतिरिक्त नीम, खजूर, बबूल तथा शीशम आदि वृक्षों की भी पूजा की जाती थी।

 

5. लिंग तथा योनियों की पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लिंग और योनि की सृजनात्मक शक्ति के रूप में पूजा करते थे। सिंधु घाटी की सभ्यता से हमें बड़ी संख्या में लिंग तथा योनियों की प्रतिमाएं मिली है‌। यह पत्थर चीनी मिट्टी तथा सीप की बनी हुई है। लिंग छोटे और बड़े दोनों आकारों में पाए गए। छोटे आकारों के लिंगो को लोग शुभ मानकर सदैव अपने साथ रखते थे। बड़े लिंगो को किसी निश्चित स्थान पर विशिष्ट कर पूजा जाता होगा। योनियां छल्ले के रुप में पाई गई है।



 

6. जल पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से मिले अनेक स्नानागार से इस बात का अनुमान लगाया गया है कि उस समय के लोगों को जल पूजा में काफी विश्वास था। धार्मिक अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग नदियां और स्नानगरों में स्नान करते थे। जल को शुद्ध और सफाई का प्रतीक समझा जाता था।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

7. सूर्य पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें जो मुहरें प्राप्त हुई है, उनमें कुछ मुहरों पर स्वास्तिक तथा चक्कर के चित्र अंकित है। यह चक्र सूर्य का प्रतीक समझा जाता है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पा के लोग सूर्य की पूजा करते थे।

 

8. जादू टोना तथा बलियों में विश्वास:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त अनेकता ताबीजों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग जादू टोना तथा भूत-प्रेतों में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त कुछ मुहरों पर मनुष्य द्वारा पशुओं को बलि देने के चित्र अंकित है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि लोग अपने देवी देवताओं को खुश करने के लिए बलि देते थे।

 

9. सांपों की पूजा:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग सांपों की पूजा करते थे। ऐसा अनुमान उस समय की प्राप्त मुहरों पर अंकित सांपों के चित्रों से लगाया जाता है। एक मुहर पर एक देवता के सिर पर फन फैलाए हुए एक नाग को दर्शाया गया है। एक अन्य मुहरें में एक मनुष्य को एक सांप को दूध पिलाते हुए दर्शाया गया है।

 

सिंधु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन

 

1. कृषि:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। इसका कारण यह था कि यह प्रदेश बहुत उपजाऊ था तथा सिंचाई के लिए पानी की कोई कमी नहीं थी। सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी खेत जोतने के लिए हलो का प्रयोग करते थे। हम उस समय खेती के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपकरणों के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते इसका कारण यह है कि यह उपकरण लकड़ी के बनाए जाते थे जो समय बीतने पर नष्ट हो गए।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी नदियों पर बांध बनाकर खेतों में सिंचाई करते थे। उस समय फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी विभिन्न प्रकार के अनाज, फल तथा सब्जियों उगाया करते थे। उनकी मुख्य फसलें गेहूं और जौ थी‌। इनके अतिरिक्त चावल, मटर, सरसों, राई तथा तिल की खेती की जाती थी‌। सिंधु प्रदेश में कपास सर्वाधिक मात्रा में उगाई जाती थी‌। हड़प्पा सभ्यता विश्व भर में कपास की उपज के लिए विख्यात थी।

 

2. पशु पालन:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। उनके बर्तनों तथा मुहरों पर बने चित्रों खिलौनों और अस्थि अवशेषों के आधार पर हम तत्कालीन पालतू पशुओं के विषय में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इन पशुओं का हड़प्पा निवासियों के आर्थिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था। वह इन्हें दूध मांस तथा बौझ ढोने के लिए उपयोग में लाते थे। वे भेड़, बकरी, गाय, भैंस तथा सूअर से दूध, ऊन तथा मांस प्राप्त करते थे। बड़े-बड़े जानवरों बैल, गधा तथा हाथी से बोझा ढोने अथवा गाड़ी खिंचवाने का काम लिया जाता था। कुत्तों को घरों की सुरक्षा तथा शिकार के लिए पाला जाता था। हड़प्पा सभ्यता के लोगों को घोड़े की जानकारी नहीं थी।

 

3. उद्योग:- कृषि तथा पशुपालन के अतिरिक्त सिंधु घाटी सभ्यता के लोग उद्योग भी चलाते थे। क्योंकि हड़प्पा क्षेत्र में कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती थी इसलिए वस्त्र उद्योग को बहुत प्रोत्साहन मिला। सिंधु घाटी निवासी सूत कातने उन्हें रंगने उन्हें सिलने तथा उन पर कढ़ाई करने में बहुत निपुण थे। वे सोना, चांदी तथा तांबा आदि धातुओं से भी परिचित थे। इन धातुओं से भी आभूषण बर्तन तथा विभिन्न प्रकार के अस्त्र शस्त्र तथा औजार तैयार करते थे।

 

4. व्यापार और वाणिज्य:- हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में व्यापक प्रगति की थी। उनका आंतरिक तथा विदेशी व्यापार दोनों उन्नत थे। व्यापार जल तथा स्थल दोनों मार्गो से होता था। व्यापार को प्रोत्साहन देने के लिए चौड़ी सड़कों का निर्माण किया गया था। बैलगाड़ियां परिवहन का मुख्य साधन थी। नदी तथा समुद्री मार्गों में नाव का प्रयोग किया जाता था। हड़प्पा के व्यापारी सूती कपड़ा, आभूषण, हाथी दांत का सामान, अनाज तथा बर्तनों का निर्यात करते थे। वे राजस्थान से संगमरमर तथा दक्षिण भारत से सोना मंगवाते थे। व्यापार वस्तु विनिमय के माध्यम से होता था। क्योंकि हमें उस समय किसी मुद्रा के प्रचलन का प्रमाण नहीं मिला।

 

5. तौल तथा माप:- हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने व्यापार की सुविधा के लिए तोल तथा माप प्रणाली प्रचलित की थी। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई के दौरान हमें बड़ी संख्या में बांट प्राप्त हुए हैं। यह विभिन्न आकारों तथा वजन वाले हैं। इनमें से कुछ बांट तो इतने बड़े हैं कि उन्हें अवश्य ही राशियों के सहारे उठाया जाता होगा। बड़ी बांटो का प्रयोग अन्य सामानों को तोलने तथा अति छोटी बांटो का प्रयोग जौहरियों द्वारा किया जाता होगा। यह बांट पत्थर के बनाए जाते थे‌। यह सभी बातें 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 के अनुपात में होते थे। बांटो के अतिरिक्त हमें हड़प्पा की खुदाई से धातु के तराजू तथा पैमाने भी मिले हैं। पैमानों का प्रयोग वस्तुओं को मापने के लिए किया जाता था।

 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का राजनीतिक जीवन।

 

सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का राजनीतिक जीवन किस प्रकार का था? इस संबंध में विद्वानों में काफी मतभेद है। इसका कारण यह है कि हड़प्पा सभ्यता की लिपि को अभी तक विद्वान पढ़ने में सफल नहीं रहे हैं। अतः हड़प्पा निवासियों के राजनीतिक जीवन संबंधी हमारा ज्ञान अधूरा है। विद्वानों ने हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों की खुदाई के आधार पर कुछ अनुमान अवश्य लगाएं हैं।

 

1. प्रशासनिक स्वरूप:- हड़प्पा सभ्यता का प्रशासनिक स्वरूप क्या था? यह निश्चित रूप से कहना अत्यंत कठिन था‌। हंटर महोदय ने यहां के शासन को जनतंत्रात्मक शासन कहा है। मैके के कथानुसार प्रतिनिधि शासक शासन का प्रधान होता था‌। वहीं व्हीलर का विचार है कि यहां का शासन धर्म पर आधारित था, तथा पुरोहित शासक शासन चलाया करते थे। जी बोनगार्ड लेविन यहां की प्रशासनिक व्यवस्था को कुलीनतंत्रीय बताया है। कुछ अन्य विद्वान इसे मध्यवर्गीय जनतंत्र मानते हैं। यह सभी विचार अनुमान पर आधारित है इन को प्रमाणित करने के लिए स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

 

2. राजनीतिक एकता:-: सिंधु घाटी सभ्यता एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी। विभिन्न स्थलों पर एक जैसी भवन निर्माण योजना सड़कों और गलियों का प्रबंध रोशनी तथा सफाई के प्रबंध तथा माप तोल के एक जैसे बांटो को पाए जाने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के सभी प्रदेशों में राजनीतिक एकता पाई जाती थी। दूसरा इससे संकेत मिलता है कि उस समय की शासन व्यवस्था काफी मजबूत रही होगी।



 

3. कुशल शासन प्रबंध:-

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता का शासन प्रबंध बहुत कुशल था‌। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो सिंधु साम्राज्य के उत्तरी तथा दक्षिणी भागों की दो राजधानियां थी। ऐसा मानने का कारण यह है कि इन दोनों स्थानों पर दुर्ग प्रकाश में आए हैं। जहां से शासक राज्य करते थे। मोहनजोदड़ो में एक विशाल सार्वजनिक भवन प्रकरण में आया है। यह संभवत परिषद के सदस्यों का स्थान था। नगरों का प्रबन्धन, अन्नागारों की व्यवस्था तथा व्यापारिक के नियम हड़प्पा सभ्यता के कुशल शासन प्रबंध का स्पष्ट प्रमाण थे।

 

4. सरकार की आय तथा खर्च:- विभिन्न विद्वानों का यह विचार है कि उस समय सरकार की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। इसे अनाज के रूप में इकट्ठा किया जाता था तथा गोदामों में रख दिया जाता था। सरकार की आय के अन्य स्रोतों के बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। सरकार अपनी आय का अधिकतर भाग शासक तथा राज्य के कर्मचारियों एवं लोक भलाई के कार्यो, सड़को, नालियों तथा सफाई आदि पर खर्च करती थी।

 

5. शस्त्र:- हड़प्पा सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। अतः वह तलवार और ढालो तथा कवचों का प्रयोग नहीं करते थे। उनकी मुख्य शस्त्र छोटी तलवारे, कुल्हाड़ियां तथा चाकू थे। यह शस्त्र तांबे तथा कांसे के बने होते थे। हमें कोई भी शस्त्र लोहे का नहीं मिला। अच्छे शस्त्रों के अभाव के कारण ही हड़प्पा निवासी आर्यों के आक्रमण का सामना ना कर सके।

 

सिंधु सभ्यता के लोगों की कला।

 

1. मूर्ति कला:- सिंधु घाटी सभ्यता के शिल्पकार मूर्ति निर्माण में बहुत निपुण थे। वह पत्थर धातु तथा टेराकोटा (पक्की ईंटों) से निर्मित मूर्तियां बनाते थे। इस काल की पत्थर से निर्मित मूर्तियां इतनी सजीव तथा सुंदर है कि उनकी तुलना यूनानी मूर्तियों से की जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें जो पत्थर की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं उनमें से मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की मूर्ति अत्यंत प्रभावशाली है। यह यह सफेद पत्थर से बनी हुई है। यह 17.5 सेंटीमीटर ऊंची है, इसे अपने शरीर को 1 शाल से लपेटा हुआ है, जिस पर 3 पत्तों का नमूना बना हुआ है।

 

हड़प्पा से हमें जो पत्थर की मूर्तियां प्राप्त हुई है उनमें लाल पत्थर से निर्मित पुरुष मूर्ति का धड़ सर्वाधिक उत्कृष्ट है। हड़प्पा सभ्यता के शिल्पकारों ने जो धातु की मूर्तियां निर्मित की है उनमें से मोहनजोदड़ो से प्राप्त “कांसे की नर्तकी” की मूर्ति सर्वाधिक विख्यात है। इस मूर्ति में नर्तकी का बाया हाथ कमर पर रखा हुआ है, तथा दाएं हाथ में बहुत ही चूड़ियां पहनी हुई है। इसके गले में एक हार हैं। हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मूर्तियों में मातृदेवी तथा नृत्य की मूर्तियां सर्वाधिक है।

 

2. मिट्टी के बर्तन बनाने की कला:- सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें बड़ी मात्रा में मिट्टी के बर्तन मिले हैं। इन्हें देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हड़प्पा के कलाकार इन बर्तनों को बनाने में कितने निपुण थे। अधिकांश बर्तन चौक पर बनाए जाते थे। कुछ बर्तन हाथ से भी बनाए जाते थे। इन बर्तनों को काले, नीले, लाल तथा पीले रंगों से रंगा जाता था। इन बर्तनों पर पालिस करके इन्हे चमकाया जाता था। इन बर्तनों पर अति सुंदर चित्रकारी भी की जाती थी। 

 

3. आभूषण कला:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने आभूषण बनाने की कला में काफी प्रगति की थी। ये आभूषण आकर्षक तथा विभिन्न नमूनों के हैं। यह आभूषण सोने, चांदी, मूल्यवान पत्थर, तांबे, हड्डियों तथा हाथी दांत के बने होते थे। इन गहनों में प्रमुख हार, कंगन, अंगूठी, पाजेब, बाजूबंद तथा कानों की बालियां थी। सिंधु निवासी मटके बनाने में विशेष रूप से विख्यात थे। इन मनको को पिरों कर माला बनाई जाती थी।

 

4. भवन निर्माण कला:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने भवन निर्माण कला के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की थी। इन भवनों का निर्माण एक निश्चित योजना बंध तरीके से किया जाता था। यह मकान पक्की ईंटों से बने होते थे। ईंटों को जोड़ने के लिए मिट्टी का प्रयोग किया जाता था। मकान की दीवारों की सुंदरता तथा मजबूती के लिए उन पर मिट्टी का प्लास्टर चढ़ा दिया जाता था। बाढ़ से भवनों की सुरक्षा के लिए उनकी नींव काफी गहरी रखी जाती थी। प्रत्येक घर में एक खुला आंगन, रसोई घर, शौचालय, स्नानागार तथा कुआं होता था।

 

मकानों में रोशनी तथा हवा की दृष्टि से दरवाजे खिड़कियों का प्रबंध किया गया था। यह सभी दरवाजे तथा खिड़कियां सड़क की ओर नहीं अपितु गली की ओर खुलती थी। घरों के गंदे पानी के निकास के लिए नालियों का उत्तम प्रबंध था। नगर का निर्माण करते समय आवागमन की सुविधा के लिए सड़कों का उचित प्रबंध किया जाता था।

 

5. चित्रकला:- सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों को चित्रकला से बहुत प्रेम था। उनकी चित्रकला के क्षेत्र में प्रगति का प्रमाण हमें मिट्टी के बर्तनों तथा मुहरों पर अंकित चित्र को देखने से मिलता है। उनके चित्र दो प्रकार के होते थे। प्रथम, रेखाचित्र और द्वितीय प्राकृतिक चित्र। प्राकृतिक चित्रों में फूल तथा पशु पक्षियों के चित्र उल्लेखनीय है। कुछ चित्रों में मानव आकृति भी बनाई गई हैं‌। इन सभी चित्रों को अनेक रंगों द्वारा सुंदर बनाया गया है। इन चित्रों में जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती हैं।

 

सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि तथा मुहरें।

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लिखने की कला से परिचित थे। इस बात का प्रमाण हमें खुदाई से प्राप्त होने वाली मुहरों, बर्तनों, पट्टियों तथा दीवारों पर अंकित लिपि से मिलता है। यह लिपि चित्रमयी है। इसलिए प्राप्त वर्णों की कुल संख्या लगभग 400 है। प्रत्येक वर्ण किसी ध्वनि भाव अथवा वस्तु का सूचक है। यह लिपि अधिकांश दाई से बाई ओर लिखी गई है। किंतु कहीं-कहीं बाई से दाई ओर भी लिखी मिलती है। इस लिपि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

इस लिपि को पढ़े न जा सकने के दो प्रमुख कारण है। प्रथम, हमें हड़प्पा की खुदाई से कोई ऐसा दिभाषी शिलालेख प्राप्त नहीं हुआ है, जिसकी एक भाषा का हमें पूर्ण ज्ञान हो। दूसरा, हड़प्पा से प्राप्त अधिकतर शिलालेख बहुत छोटे हैं। इनमें औसतन अक्सर छह हैं। सबसे लंबा शिलालेख जो हमें प्राप्त हुआ है, उसमें भी केवल 17 अक्षर हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सभी अक्षर अलग है।

 

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से हमें बड़ी संख्या में मुहरें मिली है। केवल मोहनजोदड़ो से मिली मुहरों की संख्या 1200 से अधिक है। यह मुहरें विभिन्न आकार की है, परंतु अधिकांश मुहरों का आकार छोटा है। यह मुंहरे अधिकतर सेलखड़ी पत्थर से बनी हुई थी। इनके अतिरिक्त यह मुहरें पक्की मिट्टी तथा हाथी दांत से बनी होती थी। इन मुहरों पर मनुष्य देवी-देवताओं, पशु पक्षियों तथा फूल पत्तियों के चित्र बड़ी कुशलता से बनाए गए थे। पशुओं में से एक सींग वाले पशु, छोटे सिंह वाले सांड, शेर, हाथी तथा बारहसिंघा के चित्र अधिक है।

 

इन मुहरों के प्रयोग के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। इतिहासकारों का विचार है, कि इनका प्रयोग व्यापारी अपने सामान की सुरक्षा के लिए करते थे। कुछ अन्य इतिहासकारों के अनुसार इनका प्रयोग केवल घरों की सजावट के लिए किया जाता था‌। कुछ इतिहासकारों का मत है कि इनका परिवार में बड़ा महत्व था, इसलिए इन मुहरों को पूर्वजों के चिह्न के रुप में रखा जाता था।



 

सिंधु घाटी सभ्यता की पतन की समस्या।

 

1700 ईस्वी पूर्व के लगभग हड़प्पा सभ्यता के पतन के लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। इसका कारण इस समय तक हड़प्पा सभ्यता के दो प्रमुख केंद्र हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो का नष्ट हो जाना था। यह कहना कठिन है कि हड़प्पा सभ्यता का अंत कब और कैसे हुआ? इस संबंध में विद्वानों में मतभेद बना हुआ है। जब तक विद्वान हड़प्पा सभ्यता की लिपि को पूरी तरह पढ़ने में सफल नहीं हो जाते, तब तक इस के बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कहना कठिन है।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

1. आर्यों के आक्रमण: बहुत सारे इतिहासकारों का यह मानना है कि आर्यों के आक्रमण के कारण है सिंधु घाटी सभ्यता का विनाश हुआ। ऋग्वेद में इस बात का प्रमाण मिलता है कि आर्य अपने प्रमुख देवता इंद्र से शत्रुओं के दुर्ग नष्ट करने के लिए प्रार्थना करते थे। इंद्र द्वारा नष्ट किए गए अनेक दुर्गों के नाम भी मिलते हैं। इनमें से प्रमुख था हरि यूपी। विद्वानों ने इसकी पहचान हड़प्पा से की है। इससे यह संकेत मिलता है कि हड़प्पा सभ्यता का विनाश करने वाले आर्य थे।

 

इसके अतिरिक्त हमें मोहनजोदड़ो से 38 मानव के अस्थिपिजंर मिले हैं, इन पर किसी तेज हथियार के निशान हैं। हो सकता है यह किसी बड़े आक्रमण में मारे गए थे तथा उनके संबंधियों को उनके शव विसर्जन का समय नहीं मिला। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आर्यों के आक्रमण के कारण में सिंधु घाटी सभ्यता का अंत हुआ होगा।

 

2. बाढ़:- कुछ इतिहासकारों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के विनाश का कारण सिंधु नदी तथा इसके सहायक नदियों में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ थी। हड़प्पा सभ्यता के केंद्र नदियों के किनारे बसे हुए थे। बाढ़ के प्रकोप से बचने के लिए हड़प्पा निवासी अपने भवनों को धरातल से ऊंचा करते चले गए। उनकी यह व्यवस्था लंबे समय तक कारगर सिद्ध नहीं हो सकी। वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, लोथल नगरों का विनाश बाढ़ के कारण हुआ। बाढ़ के कारण खेती, यातायात, व्यापार इत्यादि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अतः लोगों को मजबूर होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ा।

 

3. भूकंप:- कुछ विद्वानों की कथाअनुसार हड़प्पा सभ्यता का विनाश भूकंप के कारण हुआ था। इस कारण अनेक नगरों का नामो निशान मिट गया। इस भूकंप के कारण अनेक नदी मार्ग भी बदल गए, इस कारण भी अनेक बस्तियां उजड़ गई।

 

4. अग्नि:- कुछ विद्वानों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का विनाश भीषण अग्निकांड के कारण हुआ, क्योंकि उस समय भवनों में लकड़ी का बड़े पैमाने में प्रयोग किया जाता था। इस कारण अग्निकांड में अनेक नगर नष्ट हो गए। विद्वानों का यह अनुमान बलोचिस्तान में अनेक स्थानों पर पाए गए राख के अवशेषों पर आधारित है।

 

लेकिन कुछ विद्वान इस मत से सहमत नहीं है। उनका कथन है कि हड़प्पा सभ्यता के अन्य केंद्रों से अग्निकांड के प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः अग्नि से यदि कुछ स्थलों को क्षति अवश्य पहुंची होगी। लेकिन संपूर्ण हड़प्पा सभ्यता के विनाश के लिए अग्नि को ही उत्तरदाई माना कठिन है।

 

5. बदलती जलवायु:- कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का विनाश मुख्य तौर पर बदलती हुई जलवायु के कारण हुआ। शुरुआत में हड़प्पा क्षेत्र में व्यापक स्तर पर वर्षा होती थी। अतः यह यहां काफी जंगल पाए जाते थे। नगरों के भवनों में तथा ईंटों को पकाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता थी। अतः बड़े पैमाने पर जंगलों का काटा जाने लगा। जंगलों की कमी के कारण जलवायु में परिवर्तन आया‌। वर्षा की कमी के कारण भूमि पर रेगिस्तानी प्रभाव बढ़ने लगा। जिससे अकाल पड़ने लगे। जिस कारण हड़प्पा सभ्यता का विनाश हुआ।

 

6. महामारी:- कुछ विद्वानों के अनुमान के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का विनाश किसी महामारी प्लेग अथवा मलेरिया के कारण हुआ‌। इस महामारी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई। जो लोग जीवित बचे थे, उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इससे हड़प्पा सभ्यता के विकास को गहरा आघात लगा।

 

7. बढ़ती जनसंख्या:- कुछ विद्वानों का विचार है कि हड़प्पा सभ्यता के विनाश के लिए तीव्रता से बढ़ती हुई जनसंख्या काफी हद तक उत्तरदाई थी। हड़प्पा नगरों में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण प्राकृतिक तथा आर्थिक साधनों में काफी कमी आ गई। सिंधु घाटी सभ्यता का पतन सुनिश्चित हो गया।

 

8. प्रशासनिक शिथिलता:- हड़प्पा सभ्यता के पतन का एक मुख्य कारण प्रशासनिक शिथिलता थी। शुरुआत में सिंधु घाटी सभ्यता में भवनों का निर्माण योजनाबद्ध ढंग से किया जाता था। धीरे धीरे जनसंख्या के बढ़ने से जहां तहां भवनों का निर्माण किया जाने लगा। नदियों पर बनाए जाने वाले बांधों की सुरक्षा की ओर कम ध्यान दिए जाने लगा। इस प्रकार प्रशासनिक शिथिलता के आ जाने के कारण हड़प्पा सभ्यता पतन की ओर तीव्रता से अग्रसर होने लगी।

 

9. व्यापार में गिरावट:- आर० एस० शर्मा का विचार है कि विदेशी व्यापार में गिरावट हड़प्पा सभ्यता के पतन का एक मुख्य कारण था। इस गिरावट के लिए दो कारण उत्तरदाई थे। प्रथम कृषि तथा उद्योग धंधों में उत्पादन में कमी थी, दूसरा 1760 ई० पूर्व के आसपास उन देशों में राजनीतिक अस्थिरता आए जिनके साथ हड़प्पा सभ्यता के व्यापारिक संबंध थे। इससे सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई।

 

ऊपर दिए गए सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के कारणों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि सिंधु घाटी सभ्यता के विनाश के लिए कोई एक कारण उत्तरदाई नहीं था। वास्तव में इस सभ्यता के विनाश के लिए प्रकृति तथा मनुष्य दोनों ही उत्तरदायी थे।

 

सिंधु घाटी सभ्यता की देन।

 

1. हड़प्पा सभ्यता से हमने योजनाबद्ध ढंग से नगरों का निर्माण करना सीखा। भवनों के निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग, खुले तथा हवादार भवन तथा 2 तथा उससे अधिक मंजिलों के भवनों का निर्माण भी हड़प्पा सभ्यता की देन है।

 

2. हड़प्पा सभ्यता का नगर प्रबंध भी सर्वोत्तम ढंग का था। सड़के तथा गलियां चौड़ी बनाई गई थी। इनमें प्रकाश का उचित प्रबंध था। शहर में सफाई तथा गंदे पानी के निकास के लिए नालियों की उत्तम व्यवस्था थी‌। बर्तन ईंटें बनाने वाली भट्टियों को शहर से दूर बनाया जाता था। ताकि वातावरण प्रदूषित न हो सके‌। आधुनिक नगरपालिकाओं की देन हड़प्पा सभ्यता ने ही दी।

सिन्धु घाटी सभ्यता
सिन्धु घाटी सभ्यता

3. हड़प्पा सभ्यता के निवासियों से हमने घर हो और नक्षत्रों के अध्ययन के आधार पर बाढ़ आने की संभावना का पूर्व अनुमान लगाने की कला सिखी। इन्होंने ही हमें बाढ़ से अपने नगरों को सुरक्षा करने का ढंग बताया।

 

4. व्यापार के लिए बैलगाड़ी तथा नावों का प्रयोग हड़प्पा सभ्यता की ही देन थी।

 

5. हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने ही विश्व इतिहास में सर्वप्रथम कपास की खेती प्रचलित की।

 

6. हड़प्पा सभ्यता की मूर्तिकला, चित्रकला, आभूषण कला, बर्तन तथा मुहरें बनाने की कला ने आने वाली भारतीय सभ्यताओं पर गहरा प्रभाव डाला।

 

7. आज भी खेले जाने वाले शतरंज का खेल तथा वस्तुओं को तोलने के लिए प्रयोग किए जाने वाले बांटो का प्रयोग हमने हड़प्पा सभ्यता के निवासियों से सीखा।

 

8. आधुनिक स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले अनेक श्रंगार हड़प्पा की सभ्यता के समय में भी प्रचलित थे। पुरुषों ने भी केश व दाढ़ी रखने का रिवाज हड़प्पा सभ्यता के निवासियों से ही सीखा।

 

9. विवाह तथा धार्मिक उत्सव के समय ढोल बजाना हड़प्पा सभ्यता की ही देन है।

 

10. हड़प्पा सभ्यता से ही हमने चरखा और आटा पीसने वाली चक्की बनाने का ढंग सीखा है।

 

11. हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी देन धार्मिक क्षेत्र में थी‌। उस समय के देवी-देवताओं जैसे मातृदेवी, शिवजी, अग्नि, जल, सूर्य, वृक्षों तथा नाग आदि की पूजा आज भी प्रचलित है। हड़प्पा काल की तरह आज भी लोग भूत-प्रेतों तथा जादू टोने में विश्वास रखते हैं तथा उनसे बचने के लिए ताबीज आदि बांधते हैं।

 

12. आधुनिक भारतीयों में धार्मिक अवसरों पर जो नदियों और सरोवर में स्नान के प्रथा प्रचलित है। वह वास्तव में हड़प्पा सभ्यता की ही देन है।

 

ऊपर दिए गए विवरण से स्पष्ट है कि आधुनिक सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में प्रचलित अनेक रीति-रिवाजों का श्रेय हड़प्पा सभ्यता के लोगों को प्राप्त है। निसंदेह हड़प्पा सभ्यता की देन सदैव अमर रहेगी तथा इसका वर्णन स्वर्ण अक्षरों में होता रहेगा।

 

डाक्टर एस० सी० रेचौधरी के अनुसार, सिंधु घाटी की सभ्यता ने आधुनिक हिंदू संस्कृति को बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। वास्तव में सिंधु घाटी की सभ्यता की अनेक विशेषताओं को हिन्दू धर्म ने अपनाया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *