बौद्ध धर्म की पूरी जानकारी। प्राचीन इतिहास।

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बौद्ध धर्म का परिचय

महात्मा बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका आरंभिक नाम सिद्धार्थ था। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने सच्चे ज्ञान की खोज के उद्देश्य से ग्रह त्याग किया  तथा 35 वर्ष की आयु में गया नामक स्थान पर सच्चा ज्ञान प्राप्त किया। महात्मा बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया। उन्होंने 45 वर्षों तक भारत के विभिन्न स्थानों पर भ्रमण कर, लोगों में अपना ज्ञान बांटा। उनकी शिक्षाओं ने लोगों के मनों पर जादुई प्रभाव डाला। उन्होंने 4 महान सत्य अष्ट मार्ग, कर्म सिद्धांत, अहिंसा तथा आपस में भाईचारे का प्रचार किया। वह यज्ञों, बलियों, वेदो, संस्कृत भाषा, तपस्या, जाति प्रथा तथा ईश्वर में अविश्वास रखते थे।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

वह निर्वाण को मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मानते थे। महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को संगठित करने के उद्देश्य से बौद्ध संघ की स्थापना की‌। यह लोकतंत्र के सिद्धांतों पर आधारित था। बौद्ध धर्म के प्रमुख संप्रदाय हीनयान, महायान तथा वजृयान थे। बौद्ध धर्म की लोकप्रियता तथा पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदाई थे। इस धर्म ने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति पर अपनी गहरी छाप छोड़ी।

बौद्ध संघ क्या था?

महात्मा बुद्ध ने संगठित ढंग से बौद्ध धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से बौद्ध संघ की स्थापना की। संघ से भाव बौद्ध भिक्षुओं के संगठन से था। बौद्ध संघ देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए गए थे। धीरे-धीरे यह शक्तिशाली संस्था का रूप धारण कर गए तथा बौद्ध धर्म के प्रसार का प्रमुख केंद्र बन गए।




बौद्ध संघ की सदस्यता

महात्मा बुद्ध के अनुयाई दो प्रकार के थे। उन्हें उपासक उपासिकाएं तथा भिक्षु-भिक्षुणियां कहा जाता था। उपासक तथा उपासिकाएं वे थी जो गृहस्थ जीवन का पालन करते थे। भिक्षु तथा भिक्षुणियां गृह त्याग कर सन्यास धारण करते थे। आरंभ में संघ प्रवेश की विधि बहुत सरल थी, किंतु जब धीरे धीरे संघ के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगी तब महात्मा बुद्ध ने संघ में प्रवेश करने वाले सदस्यों के लिए कुछ योग्यताएं निर्धारित कर दी।

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म

इनके अनुसार अब संघ में प्रवेश पाने के लिए किसी भी स्त्री अथवा पुरुष के लिए कम से कम आयु 15 वर्ष निश्चित कर दी गई। उन्हें संघ का सदस्य बनने के लिए अपने माता पिता की आज्ञा लेना आवश्यक था। अपराधी, दास तथा रोगी संघ के सदस्य नहीं बन सकते थे। संघ में किसी भी जाति का व्यक्ति प्रवेश पा सकता था। संघ में प्रवेश करने वाले भिक्षु अथवा भिक्षु ने का सर्वप्रथम मुंडन किया जाता था तथा उसे पीले वस्त्र धारण करने पड़ते थे।

इसके बाद उसे यह शपथ ग्रहण करनी होती थी “मैं बुद्ध की शरण लेता हूं, मैं धर्म की शरण लेता हूं, मैं संघ की शरण लेता हूं, तत्पश्चात उसे संघ के सदस्यों में किसी एक को अपना गुरु धारण करना पड़ता था तथा 10 वर्षों तक उससे परीक्षण लेना पड़ता था। ऐसे सदस्यों को “श्रमण” कहा जाता था। यदि 10 वर्षों के बाद उसकी योग्यता को स्वीकार कर लिया जाता तो उसे संघ का पूर्ण सदस्य मान लिया जाता तथा उसे भिक्षु अथवा भिक्षुणी की उपाधि प्रदान की जाती।

बौद्ध धर्म के 10 आदेश

बौद्ध संघ के सदस्यों को बढ़ा अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक सदस्य को इन नियमों का पालन करना आवश्यक था। यह नियम थे..

1. ब्रह्मचर्य का पालन करना।
2. जीवो को कष्ट न देना।
3. दूसरों की संपत्ति की इच्छा न करना।
4. सदा सत्य बोलना।
5. मादक पदार्थों का प्रयोग न करना।
6. नृत्य-गान में भाग न लेना।
7. सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग न करना।
8. गद्देदार बिस्तर पर न सोना।
9.अपने पास धन न रखना।
10. निश्चित समय को छोड़कर किसी अन्य अवसर पर भोजन में करना।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

बौद्ध संघ के सदस्यों का आवास।

बौद्ध भिक्षु तथा भिक्षुणियां वर्षा काल के 3 माह को छोड़कर देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करते रहते थे तथा लोगों को उपदेश देते थे। वर्षा के तीन माह एक स्थान पर निवास करते थे, तथा अध्ययन का कार्य करते थे। उनके निवास स्थान आवास कहलाते थे। प्रत्येक आवास में उनके विहार होते थे जहां भिक्षु भिक्षुणियां के लिए अलग कमरे होते थे। इन विहारों में जीवन सामूहिक था यह बोद्ध विहार धीरे-धीरे बौद्ध धर्म तथा शिक्षा प्रचार के प्रसिद्ध केंद्र बन गए।

बौद्ध संघ का संविधान

प्रत्येक बौद्ध संघ लोकतंत्रीय प्रणाली पर आधारित था। इसके सभी सदस्यों के अधिकार समान थे। यहां कोई छोटा या बड़ा नहीं समझा जाता था। संघ में भिक्षुणगण अपनी वरिष्ठा के अनुसार आसन ग्रहण करते थे। प्रत्येक संघ की एक माह में दो बार बैठक अवश्य होती थी। प्रत्येक बौद्ध संघ में कुछ विशेष अधिकारी होते थे जिन्हें संघ के सदस्य सहमति से चुनते थे।




बौद्ध संघ में फूट।

बुद्ध संघो ने बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई। किंतु महात्मा बुद्ध के निवार्ण के सो वर्षों के बाद जब वैशाली में बौद्धों की दूसरी महासभा आयोजित की गई थी तो बौद्ध संघ में फूट पड़ गई। बौद्ध धर्म में एकता न रही। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध धर्म में 2 प्रमुख संप्रदाय हीनयान अथवा महायान में बंट गया। बुद्ध संघ की इस फूट ने भारत में बौद्ध धर्म का पतन निश्चित कर दिया।

बौद्ध धर्म की चार महासभाएं

महात्मा बुद्ध के अथक प्रयासों के कारण उनके जीवनकाल में ही बौद्ध धर्म के नींव पूर्वी भारत में मजबूत हो चुकी थी। उनके निर्वाण के बाद बौद्ध संघ ने महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों को इकट्ठा करने, संघ से संबंधित नवीन नियम बनाने तथा बौद्ध धर्म के प्रसार के उद्देश्य से समय-समय पर चार महासभा ओं का आयोजन किया गया। इन महा सभाओं के आयोजन में विभिन्न शासकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में बौद्ध धर्म केवल भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी फैला।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

1. प्रथम महासभा 487 ईसा पूर्व:- महात्मा बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के तुरंत बाद ही 487 ईसा पूर्व में राजगृह में बौद्ध भिक्षुओं की प्रथम महासभा का आयोजन किया गया। राजगृह मगध के शासक अजातशत्रु की राजधानी थी। अजातशत्रु के संरक्षण में ही इस महासभा का आयोजन किया गया। इस महासभा का आयोजित करने का उद्देश्य महात्मा बुद्ध के प्रामाणिक उपदेशों को इकट्ठा करना था। इस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। इस महासभा की अध्यक्षता महाकश्यप ने की थी।

2. दूसरी महासभा 387 ईसा पूर्व:- प्रथम महासभा के ठीक 100 वर्षों के बाद 387 ईसा पूर्व में बौद्ध भिक्षुओं ने दूसरी महासभा का आयोजन वैशाली में किया। इस महासभा का आयोजन मगध शासक कालाशोक ने किया था। इस महासभा में 700 भिक्षुओं ने भाग लिया था। इस महासभा की अध्यक्षता सभाकामी ने की थी। इस सभा का आयोजन करने का उद्देश्य यह था कि बौद्ध संघ से संबंधित 10 नियमों ने भिक्षुओं में मतभेद उत्पन्न कर दिए थे। इन नियमों के संबंध में काफी दिनों तक वाद विवाद चलता रहा। किंतु भिक्षुओं के मतभेद दूर न हो सके। परिणामस्वरूप बौद्ध भिक्षु दो संप्रदायों में बंट गया। पूर्वी वर्ग में वैशाली तथा मगध के भिक्षु सम्मिलित थे, जबकि पश्चिमी वर्ग में कौशांबी तथा अवंती के भिक्षु सम्मिलित थे।

3. तीसरी महासभा 252-251 ईसा पूर्व:- दूसरी महासभा के आयोजन के बाद बौद्ध धर्म 18 शाखाओं में विभाजित हो गया था। इनके आपसी मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म की उन्नति को गहरा धक्का लगा। बौद्ध धर्म की पुन: प्रगति के लिए तथा इस धर्म में आए कुप्रभाव को दूर करने के उद्देश्य से महाराजा अशोक ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में 252-51 ईसा पूर्व में बौद्ध भिक्षुओं की तीसरी महासभा का आयोजन किया। इस महासभा में 1000 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया। इस महासभा की अध्यक्षता मोगलिपुत तिस्स ने की थी। यह महासभा 9 माह तक चलती रही। यह महासभा बौद्ध धर्म में आई, अनेक कुप्रथाओं को दूर करने में काफी सीमा तक सफल रही। इस महासभा में कथावथु नामक ग्रंथ की रचना की गई। इस महासभा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय विदेशों में बौद्ध प्रचारकों को भेजना था।

4.चौथी महासभा 100 ई०:- महाराजा अशोक की मृत्यु के बाद बौद्ध भिक्षुओं के मतभेद दोबारा से बढ़ गए थे। इन मतभेदों को दूर करने के उद्देश्य से कुषाण शासक कनिष्क ने कश्मीर में स्थिति कुंडल वन विहार में बौद्ध भिक्षुओं की चौथी महासभा का आयोजन प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में किया था। कुछ इतिहासकारों का यह कथन है कि इस महासभा का आयोजन जालंधर में किया गया था। इस महासभा में 500 बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था।

इस महासभा की अध्यक्षता वसुमित्र ने की थी। वसुमित्र ने महाविभास नामक ग्रंथ की रचना की। जिसे बौद्ध धर्म का विश्वकोष कहा जाता है। इस महासभा में सम्मिलित एक अन्य विद्वान अश्वघोष ने बुद्धचरित नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें महात्मा बुद्ध के जीवन का वर्णन किया गया है। इस महासभा में मतभेदों के कारण बौद्ध धर्म दो प्रमुख संप्रदायों हीनयान तथा महायान में विभाजित हो गया। कनिष्क ने महायान संप्रदाय का समर्थन किया।

बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार के कारण।

महात्मा बुद्ध ने जिस धर्म की स्थापना भारत के एक छोटे से नगर में की थी, शीघ्र ही वह धर्म ने केवल भारत अपितु विश्व के अनेक देशों जैसे चीन, श्रीलंका, जापान, थाईलैंड, जावा, कंबोडिया, तिब्बती, तथा इंडोनेशिया आदि देशों में भी फैल गया। बौद्ध धर्म की सफलता के लिए कई  कारण उतरदायी थे।

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म

1. अनुकूल समय:- भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ईसा पूर्व का विशेष महत्व है। इस अवधि में धार्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्रांति आई। इस समय हिंदू धर्म बहुत जटिल तथा खर्चीला हो चुका था। लोग इस धर्म में प्रचलित अनेक कर्मकांडो, बलियों, जातीय भेदभाव तथा ब्राह्मणों के प्रभुत्व से तंग आ चुके थे। जनसाधारण के लिए ऐसे जटिल धर्म का पालन करना बहुत कठिन था। बौद्ध धर्म के दरवाजे सभी जातियों, स्त्रियों और पुरुषों के लिए खुले थे, परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म शीघ्र से लोकप्रिय हो गया।

2.सरल शिक्षाएं:- बौद्ध धर्म की शिक्षाएं बहुत सरल थी। अतः यह धर्म शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हुआ। बौद्ध धर्म में आत्मा-परमात्मा, तप तथा स्वर्ग-नरक अदि जटिल प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं था। इसके अतिरिक्त इस धर्म में वेद-वाद, ब्राह्मणवादी तथा यज्ञवादी आदि के लिए कोई स्थान न था। बौद्ध धर्म के लिए मनुष्य को न तो किसी उच्च जाति से संबंधित होना आवश्यक था तथा न ही ब्राह्मणों पर आश्रित होना जरूरी था। लोग धर्म की इन सरल शिक्षाओं से प्रेरित होकर बड़ी संख्या में लोगों इस धर्म में सम्मिलित होने लगे।

3. महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व:- महात्मा बुद्ध के महान व्यक्तित्व ने बौद्ध धर्म के प्रसार में प्रशंसनीय भूमिका निभाई। उनका चरित्र बहुत उच्च था। वह नम्रता, त्याग, सत्य तथा परोपकार की सजीव मूर्ति थे। उन्होंने जिस बात का भी प्रचार किया उसे पहले खुद अपनाया। उन्होंने मानवता के दुखों का अंत करने के उद्देश्य से अपनी शाही ऐश्वर्या सुंदर पत्नी तथा पुत्र का त्याग कर लोगों के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने 45 वर्षों में देश के विभिन्न भागों में जाकर अपने उपदेशों का प्रचार किया‌। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि महात्मा बुद्ध का व्यक्तित्व बुद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार का मुख्य कारण बना।

महात्मा बुद्ध
महात्मा  बुद्ध

4. लोक भाषा का प्रयोग:- महात्मा बुद्ध यद्यपि अनेक भाषाओं की ज्ञाता थे, किंतु उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार सदैव जनसाधारण की भाषा पाली में किया। इसलिए जनसाधारण के लिए महात्मा बुद्ध के उपदेशों को समझना कोई कठिन कार्य नहीं था। दूसरी ओर हिंदुओं के सभी धार्मिक ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गए थे। यह भाषा जनसाधारण की समझ से बाहर थी। महात्मा बुद्ध द्वारा संस्कृति का परित्याग कर पाली भाषा का उपयोग करना एक क्रांतिकारी कदम था किंतु यह कदम बोध धर्म की लोकप्रियता के लिए अति उपयोगी सिद्ध हुआ।




5. समानता का सिद्धांत: बौद्ध धर्म में जाति-पाती के लिए कोई स्थान नहीं था। इसमें ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तथा शुद्र सभी को एक समान दर्जा प्राप्त था। बुद्ध के अनुसार मनुष्य के कर्म ही उसके ब्राह्मण अथवा शुद्र होने के संबंध में सूचित करते हैं। जन्म के आधार पर सभी मनुष्य एक समान है। बौद्ध धर्म में स्त्रियां तथा पुरुषों को समान अधिकार दिए गए। उस समय हिंदू समाज में स्त्रियों तथा शूद्रों की दशा बहुत दयनीय थी। उन्होंने बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में शामिल होना शुरू कर दिया इस प्रकार बौद्ध धर्म के समानता के सिद्धांत ने उसे बहुत लोकप्रिय बनाया।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

6. बौद्ध संघ के प्रयत्न:-  बौद्ध संघ ने बौद्ध धर्म के प्रसार में अद्वितीय योगदान दिया। इसमें सभी धर्मों के लोग बिना किसी मतभेद के सम्मिलित हो सकते थे। संघ की कार्यप्रणाली जनतंत्र के सिद्धांत पर आधारित थी। इन संघों में कार्य करने वाले भिक्षु और भिक्षुनियों ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कोई प्रयास नहीं छोड़ा। इनका जीवन बहुत पवित्र था। उनके जीवन का लक्ष्य महात्मा बुद्ध के संदेशों को जनसाधारण तक पहुंचाना था। संक्षेप में बौद्ध भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों की अपूर्व श्रद्धा ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव डाला तथा वे बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म में शामिल होने लगे।

7. राजकीय संरक्षण:- बौद्ध धर्म के प्रसार में उनके शासकों ने संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया। महात्मा बुद्ध के जीवन काल में मगध, कौशल, वत्स, कोसांबी, अवंती आदि के शासकों ने अपना संरक्षण प्रदान किया। महात्मा बुद्ध के निर्वाण के बाद अशोक तथा हर्षवर्धन जैसे सम्राटों ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए अधिक प्रयास किए। उन्होंने बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया। उन्होंने बहुत ही संख्या में बौद्ध स्तूप, बौद्ध विहारओं का निर्माण करवाया। इस प्रकार राजकीय संरक्षण मिलने के कारण बौद्ध धर्म बहुत ही जल्दी लोकप्रिय हो गया।

 

8. बौद्ध विद्वान तथा विश्वविद्यालय:- बौद्ध धर्म के प्रसार में बौद्ध विद्वानों तथा विश्वविद्यालय का बहुमूल्य योगदान था। बौद्ध विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, गया तथा वल्लभी आदि बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे। इन विद्यालयों में अध्ययन के लिए बड़ी संख्या में विद्यार्थी न केवल भारत के विभिन्न भागों से अपितु विदेशों से भी आते थे। विदेशी विद्यार्थी जब अपने शिक्षा को पूरा करके अपने देशों में वापस लौटते तो बौद्ध धर्म की छाप उनके दिलों पर अंकित होती थी। इन विद्यार्थियों ने बौद्ध धर्म को अपने अपने देशों में प्रचार किया। इनके प्रयासों से बौद्ध धर्म का एक लोकप्रिय धर्म बन गया।

9. बौद्ध महासभाओं की भूमिका:- बौद्ध धर्म की समय-समय पर होने वाली चार महासभाओं ने बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन महासभा ने बौद्ध धर्म में प्रचलित मतभेदों को दूर किया तथा उसमें नवप्राण फुकें।

बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म

10. समय अनुसार परिवर्तन:- बौद्ध धर्म की यह विशेषता रही है कि इसने आवश्यकताओं और समय की मांग के अनुकूल अपने आप को ढाला। सम्राट कनिष्क के समय लोगों में मूर्ति पूजा की भावना काफी जोर पकड़ चुकी थी। अतः बोध धर्म की महायान शाखा का उदय हुआ। इसने बौद्ध धर्म के अनुयायियों को महात्मा बुद्ध की पूजा की अनुमति प्रदान की। इस प्रकार बोध धर्म की ताजगीं को उसी प्रकार बनाए रखा गया। जैसे वह महात्मा बुद्ध के समय थी। इस कारण जनसाधारण अधिक से अधिक बौद्ध धर्म की ओर रुख करते गए।

11. विरोधी धर्मों की कमी:- बौद्ध धर्म के फलने फूलने होने का एक कारण यह भी था कि उस समय कोई भी ऐसा धर्म नहीं था जो कि बौद्ध धर्म का सामना कर सकता। हिंदू धर्म अपनी दुर्बलता के कारण पतन की ओर अग्रसर हो रहा था। इसाई तथा इस्लाम धर्म का जन्म बाद में हुआ। इस प्रकार बौद्ध धर्म की उन्नति में कोई बाधा नहीं थी।

बौद्ध धर्म के पतन के कारण।

बौद्ध धर्म का भारत व विदेशों में बहुत तीव्रता से प्रचार हुआ। यह आश्चर्य की बात है कि यह धर्म भारतवर्ष जो कि इसकी जन्मभूमि थी। चौथी शताब्दी तक लगभग विलुप्त हो गया। दूसरी और विदेशों में यह शताब्दियों तक लोकप्रिय रहा था और आज भी है। भारत में बौद्ध धर्म के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदाई थे।

1. बौद्ध धर्म में परिवर्तन:- शुरुआत में बौद्ध धर्म के सिद्धांत और शिक्षाएं सरल थी, किंतु समय के साथ साथ इसमें इतने परिवर्तन हो गए कि इसका मौलिक स्वरूप ही बदल गया। बौद्ध धर्म मूर्ति पूजा का विरोध करता था, किंतु कालांतर में महात्मा बुद्ध तथा बोधिसत्व की पूजा की जाने लगी। महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार जनसाधारण की भाषा पाली में किया था। किंतु बाद में बौद्ध धर्म ने संस्कृत भाषा को अपना लिया जो कि केवल अभिजात वर्ग की ही भाषा थी। इनके अतिरिक्त हिंदू धर्म की भांति बौद्ध धर्म में भी अनेक प्रकार के बाहरी आडंबर तथा अंधविश्वास प्रचलित हो गए। ये सभी कारण बौद्ध धर्म के पतन के लिए जिम्मेदार थे।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

2. बौद्ध संघ में भ्रष्टाचार:- शुरुआत में बौद्ध संघ ने बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय बौद्ध संघ में कार्य करने वाले भिक्षु और भिक्षुनियों का जीवन बड़ा पवित्र होता था। बाद में राजकीय सहायता के कारण बौद्ध संघ धन से मालामाल हो गया, परिणामस्वरूप भिक्षु भ्रष्टाचारी और विलासी हो गए। वे अपना समय बौद्ध धर्म के प्रचार की अपेक्षा सुरा तथा सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे। 7वीं सदी तक की बौद्ध संघ कुकर्मों का केंद्र बन गया था। परिणामस्वरूप बौद्ध संघ जन-जीवन की मुख्यधारा से दूर होता चला गया। ऐसे धर्म का पतन होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

3. बौद्ध धर्म में फूट:- बौद्ध धर्म के पतन का एक मुख्य कारण यह था कि महात्मा बुद्ध के निर्वाण के पश्चात यह धर्म परस्पर फुट का शिकार हो गया। बौद्ध धर्म 18 से अधिक संप्रदायों में विभाजित हो गया। इनमें से प्रमुख संप्रदाय हीनयान, महायान, तथा वजृयान था। इन्होंने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के बारे में अलग-अलग व्याख्या शुरू कर दी। इनके आपसी मतभेदों तथा विवादों के कारण इस धर्म की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। इसने अपने अनुयायियों को मदिरापान, मांस तथा भोग विलास की आज्ञा दे दी। इसके अतिरिक्त यह संप्रदाय जादू टोनो में विश्वास रखता था। अतः बौद्ध धर्म जनसाधारण में अपना आकर्षण खो बैठा।

4. राजकीय संरक्षण की समाप्ति:- राजकीय संरक्षण की समाप्ति से बौद्ध धर्म के विकास को गहरा धक्का लगा। शुरुआत में राज्य के संरक्षण के कारण बौद्ध धर्म का प्रसार न केवल भारत अपितु विदेशों में भी हुआ। धर्म के विकास में अशोक कनिष्क तथा हर्षवर्धन नामक शासकों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके बाद कोई भी ऐसा शासक न हुआ जो बौद्ध धर्म के विकास में अभिरुचि रखता हो। इस प्रकार राजकीय संरक्षण के अभाव में बौद्ध धर्म इसका पतन हो गया।

5. हिंदू धर्म का पुनरुत्थान:- बौद्ध धर्म के पतन में हिंदू धर्म के पुनरुत्थान ने भी सहयोग दिया। शुरुआत में हिंदू धर्म को जटिलता तथा इसमें प्रचलित अंधविश्वास के कारण जनसाधारण इस धर्म से विमुख हो गए थे तथा वे बौद्ध धर्म में सम्मिलित होने लगे। कालांतर में हिंदू धर्म के घटते हुए प्रभाव से चिंतित होकर इस धर्म को भी नई दिशा देने का प्रयास किया गया। महात्मा बुद्ध को विष्णु का एक अवतार बताया गया। हिंदू धर्म में प्रचलित बुराइयों को दूर करके इसके गौरव का पुनरुत्थान स्थापित करने का प्रयास किया गया। हिंदू धर्म के पुनरुत्थान से बौद्ध धर्म को गहरा आघात लगा।

6. पुष्यमित्र का शासन:- मौर्य वंश के पतन के बाद पुष्यमित्र में एक नए वशं की नींव रखी। वह बौद्ध धर्म का कट्टर विरोधी था। उसने बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्त करने के लिए हर संभव प्रयत्न किए। उसने अपने राज्य में यह घोषणा करवा दी कि जो भी बुद्धो का सिर काट कर लाएगा उसे 10 मुहरे पुरस्कार में दी जाएगी। यह घोषणा बौद्ध धर्म के लिए हानिकारक प्रमाणित हुई।

महात्मा बुद्ध
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7. हुणो के आक्रमण:- हुणों के आक्रमण के कारण में बौद्ध धर्म को गहरा आघात लगा। हुण मध्य एशिया की एक असभ्य और हत्याचारी जाती थी। उनके नेताओं तथा मिहिर कुल ने भारत में हजारों बौद्धो की हत्या करवा दी। उन्होंने अनेक बौद्ध मठों को नष्ट कर दिया था। परिणामस्वरूप पंजाब और राजपूताना में बौद्धों का नामोनिशान मिट गया।

8. राजपूतों द्वारा विरोध:- आठवीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक उतरी भारत में राजपूत राज्य सबसे शक्तिशाली थे। वह बहुत वीर तथा लड़ाकू स्वभाव के थे। उन्होंने बौद्ध धर्म का इसलिए विरोध किया क्योंकि यह धर्म अहिंसा के सिद्धांत पर बल देता था। राजपूतों का विरोध बौद्ध धर्म के पतन का एक मुख्य कारण बना।

9. मुसलमानों के आक्रमण:- 11वीं तथा 12 वीं शताब्दी में मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण शुरू कर दिए थे। वह अहिंसा की नीति के कारण मुस्लिम आक्रमण का सामना न कर सके। मुसलमानों ने बौद्धों को ध्वस्त कर दिया। नालंदा विश्वविद्यालय पूरी तरीके से जला दिया गया। इस प्रकार मुस्लिम आक्रमण के कारण बौद्ध धर्म भारत में पूरी तरीके से नष्ट हो गया।

बौद्ध धर्म का प्रभाव

यद्यपि बौद्ध धर्म भारत से लुप्त हो चुका है, परंतु भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को इस की देन को कभी भुलाया नहीं जा सकता। बुद्ध धर्म ने भारत को कई क्षेत्रों में बड़ी गौरव पूर्ण धरोहर प्रदान की।

 

1. राजनीतिक प्रभाव:- बौद्ध धर्म ने भारत में राजनीतिक स्थिरता, शांति तथा आपस में एकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध धर्म के अहिंसा तथा शांति के सिद्धांतों से उस समय के शक्तिशाली शासक बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने युद्ध त्याग कर दिया और अपना समय पर जन कल्याण में लगा दिया। इससे राज्य में शांति स्थापित हुई, और प्रजा काफी समृद्ध हो गई। अशोक तथा कनिष्क जैसे शासकों ने विदेशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए अपने प्रचारक भेजें। इससे भारत तथा इन देशों में मित्रता स्थापित हुई।

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

परंतु बौद्ध धर्म के अहिंसा के सिद्धांत का भारत की राजनीतिक क्षेत्र में कुछ विनाशकारी प्रभाव पड़ा। युद्ध में भाग न लेने के कारण भारतीय सेना बहुत कमजोर हो गई। इस कारण जब बाद में भारतीयों को विदेशी आक्रमण का सामना करना पड़ा तो उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। इन पराजयों के कारण भारतीयों ने अपनी स्वतंत्रता गवा दी और दासता का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

 

2. धार्मिक प्रभाव:- बौद्ध धर्म की धार्मिक क्षेत्र में देन भी बड़ी महत्वपूर्ण थी। बौद्ध धर्म के उदय से पूर्व हिंदू धर्म में अनेक कुप्रथाएं प्रचलित थी। लोग धर्म के वास्तविक रूप को भूलकर कर्मकांड और पाखंड के चक्रों में फंसे हुए थे। समाज में ब्राह्मणों का बोलबाला था। उनके बिना कोई धार्मिक कार्य पूरा नहीं समझा जाता था। परंतु उस समय ब्राह्मण बहुत लालची तथा भ्रष्टाचारी हो चुके थे। उनका मुख्य उद्देश्य लोगों को किसी ने किसी बहाने लूटना था। वे लोगों का सही मार्गदर्शन करने की अपेक्षा स्वंय भोग विलास में डूबे रहते थे।

 

महात्मा बुद्ध ने हिंदू धर्म में प्रचलित इन कुप्रथाओं का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति बिना ब्राह्मणों के सहयोग से अपने धार्मिक कार्य संपन्न कर सकता है। उन्होंने संस्कृत भाषा की पवित्रता का भी खंडन किया‌ इस कारण काफी संख्या में लोग हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म में शामिल होने लगे। इसलिए हिंदू धर्म ने अपनी लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए अनेक आवश्यक सुधार किए।

 

3. सामाजिक प्रभाव:- सामाजिक क्षेत्र में बौद्ध धर्म की देन बहुत प्रशंसनीय है। बौद्ध धर्म के उदय से पहले हिंदू धर्म में जाति प्रथा बड़ी जटिल हो गई थी। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। शुद्रों पर अनेक अत्याचार किए जाते थे। महात्मा बुद्ध ने जाति प्रथा के विरुद्ध जोरदार प्रचार किया। उन्होंने अपने अनुयायियों को आपस में भाईचारे का भाव रखने का संदेश दिया।

 

महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म में सभी जातियों और वर्ग को सम्मिलित करके भारतीय समाज को एक नया रूप प्रदान किया। निम्न वर्ग के लोगों को भी समाज में प्रगति करने का अवसर मिला। बौद्ध धर्म के प्रभाव से लोगों ने मांस, मदिरापान तथा अन्य नसों का सेवन बंद कर दिया और उन्होंने सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया।

 

4. सांस्कृतिक प्रभाव:- सांस्कृतिक क्षेत्र में बौद्ध धर्म ने भारत को बहुत ही महत्वपूर्ण देन दी। बौद्ध संघों द्वारा न केवल बौद्ध धर्म प्रचार किया जाता था अपितु यह शिक्षा देने के विख्यात केंद्र भी बन गए। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला नामक बौद्ध विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में छात्र विदेशों से आते थे। बौद्ध विद्वानों द्वारा रचित एक ग्रंथ जैसे त्रिपिटक, जातक, महाभाष्य आदि ने भारतीय साहित्य में बहुमूल्य वृद्धि की।

 

भवन निर्माण कला और मूर्तिकला के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म की देन को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। अशोक तथा कनिष्क के राज्य काल में भारत में बड़ी संख्या में स्तूपों तथा विहारओं का निर्माण हुआ। महाराजा अशोक द्वारा निर्मित करवाए गए सांची तथा भरहुत स्तूप की सुंदर कला को देख कर हर व्यक्ति चकित रह जाता है। कनिष्क के समय गांधार और मथुरा कला का विकास हुआ। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बौद्ध धर्म ने सांस्कृतिक क्षेत्र में भारत को बहुत ही महत्वपूर्ण देने दे।

 

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