जैन धर्म के इतिहास की पूरी जानकारी। प्राचीन भारत।

 3,105 total views,  4 views today




जैन धर्म का परिचय

स्वामी महावीर जी को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वह जैन धर्म के 24वें तीर्थकर थे। उनसे पूर्व 23 तीर्थकर और हुए थे। प्रथम तीर्थकर का नाम ऋषभ देव तथा 23वें तीर्थकर का नाम पार्श्वनाथ था। जैन धर्म को आरंभ में निर्ग्रंथ का नाम दिया गया था। निर्ग्रंथ का शाब्दिक अर्थ है- सांसारिक बंधनों से मुक्ति। जैन धर्म ने त्रिरत्न, अहिंसा, कठोर तप, कर्म सिद्धांत तथा आपसी भाईचारे का प्रचार किया।

जैन धर्म
जैन धर्म

जैन धर्म का यज्ञों, बलियों, संस्कृत भाषा, जाति प्रथा तथा ईश्वर में विश्वास न था। जैन धर्म की शिक्षाएं यद्यपि सरल थी, किन्तु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। जैन धर्म अनेक संप्रदायों में विभाजित था। इसके दो प्रमुख संप्रदाय दिगंबर तथा श्वेतांबर थे। जैन धर्म ने भारतीय संस्कृति को बहुमूल्य देन दी।

जैन धर्म की उत्पत्ति।

जैन धर्म की गणना भारत के सबसे प्राचीन धर्म में की जाती है। विद्वान इस धर्म का संबंध हड़प्पा सभ्यता से जोड़ते हैं। वैदिक साहित्य में जैन धर्म के तीर्थ स्थलों का वर्णन आता है। इससे स्पष्ट होता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन शब्द संस्कृत शब्द की जिन से निकला है जिसका भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों तथा मन पर विजय प्राप्त कर ली है। जैन धर्म को आरंभ में निर्ग्रंथ का नाम दिया गया निर्ग्रंथ का शाब्दिक अर्थ था सांसारिक बंधनों से मुक्ति। जैन धर्म के आचार्यों को तीर्थकर कहा जाता है। तीर्थंकर वह ज्ञानवान महापुरुष है जो मनुष्य को इस भवसागर से पार उतार दे। जैन धर्म वाले 24 तीर्थकर में विश्वास रखते हैं।
इनके नाम तथा चिह्न यह है…

1. श्री ऋषभनाथ- बैल
2. श्री अजितनाथ- हाथी
3. श्री संभवनाथ- अश्व (घोड़ा)
4. श्री अभिनंदननाथ- बंदर
5. श्री सुमतिनाथ- चकवा
6. श्री पद्मप्रभ- कमल
7. श्री सुपार्श्वनाथ- साथिया (स्वस्तिक)
8. श्री चन्द्रप्रभ- चन्द्रमा
9. श्री पुष्पदंत- मगर
10. श्री शीतलनाथ- कल्पवृक्ष
11. श्री श्रेयांसनाथ- गैंडा
12. श्री वासुपूज्य- भैंसा
13. श्री विमलनाथ- शूकर
14. श्री अनंतनाथ- सेही
15. श्री धर्मनाथ- वज्रदंड,
16. श्री शांतिनाथ- मृग (हिरण)
17. श्री कुंथुनाथ- बकरा
18. श्री अरहनाथ- मछली
19. श्री मल्लिनाथ- कलश
20. श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- कच्छप (कछुआ)
21. श्री नमिनाथ- नीलकमल
22. श्री नेमिनाथ- शंख
23. श्री पार्श्वनाथ- सर्प
24. श्री महावीर- सिंह




3 महत्वपूर्ण तीर्थंकरों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां।

जैन धर्म के तीर्थंकर ऋषभदेव
जैन धर्म के तीर्थंकर ऋषभदेव

1. ऋषभदेव

ऋषभदेव को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने अनेक जन कल्याण के कार्य किए। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया था तथा आप संसार त्याग कर तपस्या करने लगे। अंत में उन्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे में लोगों को उपदेश दिया। इस प्रकार वह प्रथम तीर्थकर कहलाए। ऋषभदेव के पश्चात होने वाले तीर्थंकरों के बारे में हमें प्रमाण के अभाव में कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है।

2. स्वामी पार्श्वनाथ

जैन धर्म के तीर्थंकर पार्श्वनाथ
जैन धर्म के तीर्थंकर पार्श्वनाथ

स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पूर्व बनारस के शासक के अश्वसेन के यहां हुआ था। उनकी माता जी का नाम वाम देवी था। उनका बचपन राजकीय वैभव में व्यतीत हुआ। युवावस्था में इनका विवाह कुशलस्थल देश के राजा नरवर्मन की सुपुत्री प्रभावती से हुआ। 23 वर्ष की आयु में पार्श्वनाथ ने संसार को त्याग दिया तथा सच्चे ज्ञान की खोज में निकल पड़े। घोर तपस्या के बाद 84वें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद वह 70 वर्षों तक लोगों को अपने ज्ञान का उपदेश देते रहे। 777 ईसा पूर्व के लगभग उन्होंने बिहार के समेता पर्वत पर निर्वाण प्राप्त किया।

3. स्वामी महावीर।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। उन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनका जन्म 599 ईसा पूर्व में वैशाली बिहार के निकट कुंडग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था, और वह क्षत्रिय कबीले जंनतंत्रिका के प्रधान थे। उनकी माता जी का नाम त्रिशला था।

महावीर को आध्यात्मिक कार्यों में मगन देखकर उनके पिता को चिंता होने लगी। वह उसे एक चक्रवर्ती सम्राट के रूप में देखना चाहते थे। अतः महावीर का ध्यान सांसारिक कार्यों में लगाने के लिए उनका विवाह यशोदा नामक एक सुंदरी राजकुमारी से कर दिया गया। विवाह के समय महावीर जी की आयु क्या थी इस संबंध में हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है।

जब महावीर की आयु 30 वर्ष की हुई तो उनके माता पिता की मृत्यु हो चुकी थी। अतः महावीर ने अपने बड़े भाई नंदीवर्धन से आज्ञा लेकर गृहस्थी का त्याग कर दिया। गृहस्थी त्यागने के बाद महावीर ने 12 वर्षों तक ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से कठोर तपस्या की‌। 1 वर्ष के बाद उन्होंने अपने वस्त्र उतार दिए तथा वह नग्न रहने लगे। उन्होंने अपने शरीर को अनेक प्रकार के कष्ट दिए। महावीर जी गर्मियों में धूप तथा सर्दी में छाया में तप करते थे।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर की आयु 42 वर्ष थी। महावीर ने ज्ञान प्राप्ति के बाद 30 वर्षों तक भारत के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। उनकी मधुर वाणी तथा विचारों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई बन गए। स्वामी महावीर ने 72 वर्ष की आयु में 527 ईसा पूर्व में पावा (पटना) में निर्वाण प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14000 अनुयायी थे।

जैन धर्म का विकास

स्वामी महावीर जी के जीवन काल में जैन धर्म बिहार तथा उसके कुछ निकटवर्ती प्रदेशों में फैला। किंतु उनके निर्वाण के बाद यह धर्म लगभग संपूर्ण भारत में लोकप्रिय हुआ। जैन धर्म को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से हर्यक वंश के शासकों तथा नंद वंश के शासकों ने प्रशंसनीय योगदान दिया। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त ने जैन भिक्षु भद्रबाहु से प्रभावित होकर जैन धर्म को स्वीकार कर लिया था। अतः चंद्रगुप्त ने अपना सिंहासन त्याग दिया तथा वह भद्रबाहु के साथ मैसूर चला गया। चंद्रगुप्त तथा भद्रबाहु के प्रयासों से जैन धर्म का मैसूर में प्रसार हुआ।

जैन धर्म के लोग
जैन धर्म के लोग

सम्राट अशोक के समय जैन धर्म का कश्मीर में प्रसार हुआ। सम्राट अशोक के पुत्र संम्प्रति के ने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया। उसने इस धर्म को अपनी राजधानी उज्जैन में फैलाया। दूसरी सदी ईसा पूर्व कलिंग के शासक खारवेल जो जैन धर्म का अनुयाई था ने इस धर्म के प्रसार में अथक प्रयास किए। कुषाण काल में मथुरा जैन धर्म के प्रचार का एक प्रमुख केंद्र बना।

राष्ट्रकूट शासकों ने जैन धर्म का गुजरात में प्रसार किया। 11वीं तथा 12 वीं सदी में राजपूत शासकों ने जैन धर्म का मालवा, राजस्थान, गुजरात तथा बुंदेलखंड में प्रसार किया। दिल्ली सल्तनत तथा मुगल काल में यद्यपि जैन धर्म का कोई राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ, किंतु इस धर्म का अस्तित्व बना रहा।




दिगम्बर तथा श्वेताम्बर

जैन धर्म के सभी संप्रदायों में दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। अतः भद्रबाहु जो जैनियों का प्रमुख नेता था अपने साथ अनेक भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया था। जो भिक्षु मगध में रह गए थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना नेता चुन लिया। इन भिक्षुओं ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया तथा अपने साहित्य को एक नया रूप प्रदान किया। उन्होंने इस साहित्य को अंग का नाम दिया।

दिगम्बर तथा श्वेताम्बर
दिगम्बर तथा श्वेताम्बर

इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नग्न रहने की प्रथा को त्याग दिया तथा श्वेत वस्त्र धारण करने आरंभ कर दिए। 12 वर्षों के बाद जब भद्रबाहु अपनी भिक्षु और भिक्षुणियों के साथ उन्हें मगध में आया तो वह स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों से सहमत न हुआ। परिणामस्वरुप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर तथा श्वेतांबर में विभाजित हो गए।

दिगंबर से अभिप्राय नग्न रहने वाले तथा श्वेतांबर से अभिप्राय था- श्वेत वस्त्र धारण करने वाले।

जैन धर्म के प्रसार के कारण

स्वामी महावीर के जीवन काल में जैन धर्म भारत के एक छोटे से भाग में सीमित था। उसके निर्वान के बाद यह धर्म धीरे-धीरे संपूर्ण भारत में फैल गया इस धर्म की लोकप्रियता के लिए अनेक कारण उत्तरदाई थे।

1.‌ सरल शिक्षाएं:- जैन धर्म की शिक्षाएं बहुत सरल थी। इसमें जाति प्रथा, यज्ञ, बलिया, ब्राह्मणों तथा अंधविश्वासों आदि के लिए कोई स्थान न था। इसमें परमात्मा तथा स्वर्ग नरक आदि जटिल प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं था। कोई भी व्यक्ति त्रिरत्नों का पालन कर निर्वाहन प्राप्त कर सकता था। इसके नियम जनसाधारण के लिए कठिन नहीं थे। अतः उन्होंने इस धर्म का स्वागत किया।

2. लोक भाषा में प्रचार:- हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखी गई थी। इनका अध्ययन केवल ब्राह्मण ही कर सकते थे। अतः यह ग्रंथ जनसाधारण की समझ से परे थे। स्वामी महावीर ने अपने उपदेशों का प्रचार लोगों की आम भाषा में किया। अतः लोगों के लिए जैन धर्म के सिद्धांतों को समझना आसान था और इस धर्म की ओर आकर्षित हुए।

जैन मुनि
जैन मुनि

3. स्वामी महावीर का व्यक्तित्व:- जैन धर्म के प्रसार में स्वामी महावीर के व्यक्तित्व का प्रमुख योगदान था। उनका व्यक्तित्व मधुर वाणी, सहनशीलता, दया, कठोर तप, त्याग का सजीव उदाहरण था। उनके इन चारित्रिक गुणों ने लोगों के मनों पर जादुई प्रभाव डाला। उन्होंने जिस बात का भी प्रचार किया उसी पहले खुद अपनाया। उन्होंने अपने शाही ऐश्वर्या सुंदर पत्नी तथा पुत्री आदि का त्याग कर तथा 12 वर्षों तक कठोर तपस्या करके लोगों के सम्मुख एक नया उदाहरण प्रस्तुत की। अतः बड़ी संख्या में लोगों ने जैन धर्म में सम्मिलित होना शुरू कर दिया।

स्वामी महावीर
स्वामी महावीर

4. राजकीय संरक्षण:- जैन धर्म के प्रसार में राजकीय संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वामी महावीर के उपदेशों से प्रभावित होकर अनेक शासकों ने जैन धर्म को स्वीकार कर लिया था। इनमें प्रमुख बिंबिसार, अजातशत्रु, उदयन, चेटक, चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक का पौत्र सम्प्रत्ति, कलिंग का शासक खारवेल, बंगाल के शासक वस्तुपाल तथा तेजपाल थे। परिणामस्वरूप जैन धर्म की लोकप्रियता में बहुत वृद्धि हुई।

5. समानता का सिद्धांत:- जैन धर्म की लोकप्रियता का एक अन्य प्रमुख कारण इसका समानता का सिद्धांत था। इस धर्म ने जाति प्रथा का कठोर विरोध किया। स्वामी महावीर ने जैन धर्म के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिए। उनका कहना था कि सभी जीवो में समान आत्मा का निवास है। अतः निर्वाण प्राप्ति के लिए किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही स्त्रियों को भी जैन धर्म में शामिल होने की आज्ञा दी गई। इस कारण जनसाधारण ने जैन धर्म को अपना समर्थन दिया।

6. अनुकूल समय: छठी शताब्दी में जब जैन धर्म का उदय हुआ तो उस समय तक हिंदू धर्म बहुत जटिल हो चुका था। लोग इस धर्म के अनेक कर्मकांडो से बहुत परेशान थे। वह एक ऐसे नवीन धर्म की आशा कर रहे थे जो इस प्रकार के कर्मकांड से पूरी तरीके से मुक्त हो। जैन धर्म ने लोगों की इस आकांक्षा को पूरा किया। अतः अधिक संख्या में लोग जैन धर्म में सम्मिलित होने लगे

जैन संघ

जैन संघ की स्थापना स्वामी महावीर जी ने पावा नामक नगरी में की थी। जब ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर इस नगरी में पहुंचे तो उस समय इस नगरी में ब्राह्मणों का एक यज्ञ चल रहा था। स्वामी महावीर के आगमन की सूचना पाकर 11 ब्राह्मण उनसे वाद-विवाद करने आए। यह सभी ब्राह्मण स्वामी महावीर से परास्त हो गए। इसके बाद वे सभी अपने शिष्यों के साथ जैन धर्म में शामिल हो गए। अतः स्वामी महावीर ने उनके कार्यों के निरीक्षण के लिए जैन संघ की स्थापना की।

जैन संघ
जैन संघ

जैन संघ का प्रमुख आचार्य कहलाता था। आचार्य का प्रमुख कार्य जैन संघ के भिक्षुओं पर नियंत्रण रखना था। केवल उसे ही दीक्षा देने, संघ का सदस्य बनाने अथवा किसी सदस्य को सजा देने का अधिकार प्राप्त था। अतः इस पद पर बहुत ही योग्य और चरित्र वाले व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था। आचार्य को उसके कार्यों में सहयोग देने के लिए उपाध्याय को नियुक्त किया जाता था। स्त्रियों के संघ अलग होते थे। इसके प्रमुख को प्रवतर्नी कहा जाता था। वह अपने अधीन संघ में अनुशासन स्थापित करती थी।

जैन धर्म के प्रसार में जैन संघ जैन संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संघ के द्वार बिना किसी जाति धर्म अथवा लिंग के भेदभाव के सभी के लिए खुले थे। इसके सदस्यों को पवित्र और नियम पूर्वक जीवन व्यतीत करना पड़ता था। धीरे धीरे ये संघ जैन धर्म शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र बन गए। इन संघों में कार्य करने वाले भिक्षुओं तथा भिक्षुणियों ने जैन धर्म के प्रसार में कोई प्रयास शेष ने छोड़ा। अतः जैन धर्म की लोकप्रियता काफी बढ़ गई।

जैन धर्म की देन।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह उन्नत नहीं हो सका, किंतु इसने भारत के सामाजिक, धार्मिक सांस्कृतिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में अपनी गहरी छाप छोड़ी।

1. सामाजिक देन:- सामाजिक क्षेत्रों में जैनियों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में हिंदू समाज में जाति प्रथा बहुत जटिल हो गई थी। समाज प्रमुख चार जातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र में विभाजित था। समाज में ब्राह्मण वर्ग को विशेष अधिकार प्राप्त थे। यह वर्ग अपनी स्वार्थी हितों के लिए लोगों का शोषण कर रहे थे। प्रत्येक जाति का व्यवसाय जन्म पूर्व निर्धारित था। इसे किसी भी व्यक्ति को चाहे उसमें कितनी भी योग्यता क्यों न हो परिवर्तित करने का कोई अधिकार नहीं था।

शुद्रो को समाज में सबसे निम्न स्थान प्राप्त था। उनके साथ पशुओं से भी क्रूर व्यवहार किया जाता था। स्वामी महावीर ने ऐसे समाज को एक नया रूप प्रदान करने के उद्देश्य से जाति प्रथा पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने ब्राह्मण वर्ग द्वारा जनसाधारण की लूट-खसोटी की आलोचना की। इससे जहां लोगों की आपसी घृणा दूर हुई वहीं निम्न वर्ग के लोगों को समाज में एक नया सम्मान मिला। स्वामी महावीर ने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देकर उनमें आत्मसम्मान की एक नई भावना उत्पन्न की।

2. धार्मिक देन:- जैन धर्म ने धार्मिक क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। इस धर्म ने जैन धर्म के द्वार निम्न जातियों तथा महिलाओं के लिए खोलकर एक क्रांतिकारी कदम उठाया। इसने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। इस धर्म में व्यर्थ के कर्मकांड के लिए कोई स्थान नहीं था। अतः जैन धर्म की लोकप्रियता तीव्रता से बढ़ने लगी। इससे प्रभावित होकर हिंदू धर्म के नेताओं ने अपने धर्म में नव प्राण फूंकने के उद्देश्य से हिन्दू में प्रचलित व्यर्थ के रीति-रिवाजों को दूर किया।

जैन धर्म के लोग
जैन धर्म के लोग

जैन धर्म ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता के नीति का प्रचलन करके एक नई उदाहरण प्रस्तुत की। इसी कारण शताब्दियों के बाद आज भी जैन धर्म भारत में मौजूद है तथा लोगों की प्रेरणा का स्रोत है।

3. सांस्कृतिक देन:- जैन धर्म में संस्कृति के क्षेत्र में प्रशंसनीय योगदान दिया। जैन विद्वानों ने भारत की अनेक भाषाओं में अनेक ग्रंथों की रचना की। इससे जहां भारतीय भाषाओं को एक नया प्रोत्साहन मिला वहीं साहित्य का भी काफी विकास हुआ। कला के क्षेत्र में जैन कलाकार किसी प्रकार से कम नहीं थे।

उन्होंने भवन निर्माण कला, मंदिर निर्माण कला, मूर्तिकला तथा चित्रकला के क्षेत्र में जो अमूल्य योगदान दिया उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। राजस्थान में आबू पर्वत पर बने दिलवाड़ा के मंदिर तथा मध्य प्रदेश में बने खजुराहो के मंदिर जैन मंदिर निर्माण कला के नमूने हैं।

4. जन कल्याण के क्षेत्र में देन:- स्वामी महावीर ने अपने अनुयायियों को समाज सेवा का उपदेश दिया था। अतः जैनी जन कल्याण के कार्य करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। उन्होंने यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक धर्मशालाओं तथा गरीबों और अनाथो की देखभाल के लिए अनेक अनाथालय की स्थापना की।

शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य के साथ देश भर में अनेक शैक्षणिक संस्थाएं खोली गई। जैनी स्त्रियों की शिक्षा पर विशेष बल देते थे। उन्होंने मनुष्य तथा पशु चिकित्सा के लिए अनेक हस्पताल स्थापित किए। जैनियों द्वारा स्थापित विभिन्न संस्थाएं आज भी उत्साह पूर्ण ढंग से कार्य कर रही है तथा आधुनिक भारत के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं।

5. राजनीतिक देन:- जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत ने भारतीयों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इसने लोगों को शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरणा दी। इसके परिणामस्वरूप कई राजाओं ने युद्ध में भाग लेना बंद कर दिया ताकि निरपराध लोगों का खून ने बहाया जाए। वे शांतिप्रिय बन गए। इस कारण भारत में चिरकाल तक शांति तथा समृद्धि का वातावरण बना रहा।

परंतु दूसरी ओर इसका भारतीय राजनीति पर कुछ कुप्रभाव भी पड़े। युद्ध में भाग लेने के कारण भारतीय सेना कमजोर हो गई। परिणामस्वरुप भारतीय शासक बाद में होने वाली विदेशी आक्रमण का डटकर मुकाबला नहीं कर सके। इसलिए भारतीयों को सैकड़ों वर्ष तक दासता का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *