इतिहास क्या है? इतिहास की परिभाषा, महत्त्व और इतिहास को पढ़ना क्यों जरूरी है?

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किसी भी देश के विकास को जानने के लिए उसके इतिहास को जानना बहुत ही जरूरी है। इतिहास क्या है? इतिहास की क्या परिभाषा है? इस संबंध में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग तरीके से अपनी बात को रखा है, इस कारण इतिहास की कोई भी सर्वमान्य परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकी है। इतिहास मनुष्य और समस्त मानव जाति द्वारा की गई उन्नति का विवरण जानने के लिए एक मील पत्थर का काम करता है। समाज के उज्जवल भविष्य के लिए हमें अतीत का इतिहास जानना बहुत जरूरी है, अतीत का अध्ययन कर हम न केवल अपनी बहुमूल्य विरासत के बारे में जान सकते है, अपितु उन कुप्रथाओं के बारे में भी ज्ञान प्राप्त करते है जो देश की प्रगति में मुख्य बाधक रही है।

इतिहास क्या है?
इतिहास क्या है?

तो दोस्तों यदि आप यह जानना चाहते हो कि इतिहास क्या है? इतिहास की क्या परिभाषा है? इतिहास शब्द की उत्पत्ति कहां से हुई? इतिहास पढ़ना क्यों जरूरी है? इतिहास का क्या महत्व है? तो आप इस लेख को अंत तक पढ़ते रहिए आपको इन सभी सवालों के जवाब Amku Education के इस Article मिल जाएंगे।

 

इतिहास क्या है? What is History?

इतिहास शब्द की उत्पत्ति “इति-ह-आस” इन तीन शब्दों से मानी गई है। इसका अर्थ है ‘निश्चित रूप से ऐसा हुआ था।’ इतिहास शब्द जर्मन भाषा के शब्द गेस्चिचटे से लिया गया है। इसका अर्थ है “अतीत की घटनाओं का ऐसा वर्णन जो स्पष्ट रूप में समझ में आ सके।” इतिहासकार का यही कार्य है कि वह अतीत यानि इतिहास की घटनाओं को इस ढंग से पाठक के सामने रखे कि पाठक उसे आसानी से समझ सके।

 

यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस को आधुनिक इतिहास का जनक माना जाता है। उसने इतिहास के लिए प्रथम बार हिस्ट्री (History) शब्द का प्रयोग किया था।

 

इतिहास क्या है? यह बहुत ही सरल और आसान प्रश्न है, परंतु इसका उत्तर इतना ही जटिल और कठिन है कि अभी तक इतिहास की कोई सर्वमान्य परिभाषा निश्चित नहीं की जा सकी है। चालर्स फर्थ ने तो यहां तक लिखा है कि इतिहास को परिभाषित करना सरल नहीं है।
इतिहासकारों ने अपने अपने ढंग से इतिहास की परिभाषा बताई है। इनका संक्षिप्त वर्णन नीचे दिया गया है।

 

1. इतिहास एक कहानी है (History Is A Story)–कुछ विद्वानों ने इतिहास को मात्र एक कहानी कहा है। जी जे रेनियर ने हिस्ट्री को एक स्टोरी (कहानी) के रूप में प्रस्तुत किया है उसने हिस्ट्री के शब्द “हि” को अलग करके “स्टोरी” के रूप में देखा है। उसके अनुसार “इतिहास सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्य के कार्यों एवं उपलब्धियों का उल्लेख होता है।”

 

यहाँ पर सभ्य समाज से अभिप्राय है संगठित समाज तथा राज्य। जंगलों में जीवन व्यतीत करने वाले असंगठित मनुष्य का इतिहास नहीं होता है, संगठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने ढंग से कार्य करता है यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति का अपना इतिहास होता है किंतु उसका उल्लेख कर पाना संभव नहीं होता। समाज का नेतृत्व कुछ व्यक्ति करते हैं, इसलिए उनके कार्यों का उल्लेख इतिहास में होता है।

इतिहास क्या है?
इतिहास क्या है?

हेनरी पिरेण के अनुसार इतिहास समाज में रहने वाले मनुष्य के कार्यों और उपलब्धियों की कहानी है। यह परिभाषा भी गलत है क्योंकि समाज में रहने वाले सभी मनुष्य का इतिहास में जिक्र नहीं होता है। इतिहासकार केवल समाज का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों के कार्यों और उपलब्धियों का वर्णन इतिहास में करता है, अतः इतिहास को सभी व्यक्तियों के कार्यों और उपलब्धियों की कहानी स्वीकार नहीं किया जा सकता।

 

2. इतिहास एक सामाजिक विज्ञान है:- कुछ इतिहासकारों ने इतिहास को एक सामाजिक विज्ञान भी बताया है, इतिहास को एक सामाजिक विज्ञान मानने वालों में यार्क पावेल, A.L राउज, चाल्र्स फर्थ एंव हेनरी पिरेन के नाम उल्लेखनीय है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य भौगोलिक परिस्थिति में कार्य करता है तथा विचार करता है भौगोलिक परिस्थितियां मनुष्य की कार्य क्षमता को प्रभावित करती है। इतिहास को ठीक ही सामाजिक विज्ञान का उद्गम स्थल माना जाता है, इससे अभिप्राय यह है कि इतिहास में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास का उल्लेख आवश्यक है।



 

3. इतिहास एक विज्ञान है:- 1859 ईस्वी में चार्ल्स डार्विन ने अपने प्रसिद्ध पुस्तकें ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज(On The Origin Of Species) में इतिहास के अध्ययन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया और उसे अन्य विज्ञानों के साथ संबंध किया। डार्विन के पश्चात एक प्रोफेसर J B ब्यूरी ने इतिहास को अन्य प्रभाव से मुक्त करके उसके अध्ययन के क्षेत्र को विस्तृत किया। उनके अनुसार इतिहास विज्ञान की श्रेणी में आता है, वह लिखते है कि इतिहास साहित्य की एक शाखा नहीं है वह एक विज्ञान है न उससे कम और अधिक।

इतिहास को विज्ञान न मानने वाले कहते हैं कि इतिहास के निर्णय निश्चित नहीं होते जबकि विज्ञान के निश्चित होते हैं अतः इतिहास कभी भी ज्ञान नहीं हो सकता।

 

4. इतिहास ज्ञान पर आधारित है:- इतिहास ज्ञान की एक शाखा है, ज्ञान के ही बलबूते पर मनुष्य आज यह सभी प्राणियों से महान माना जाता है ज्ञान का अर्थ है जानकारी ऐतिहासिक ज्ञान एक चिंतन की प्रक्रिया है ऐतिहासिक ज्ञान को ही इतिहासवाद कहा जाता है यह ज्ञान शिक्षा पर आधारित होता है अतः इसे काल्पनिक नहीं माना जा सकता।

इतिहास क्या है?
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नवपाषाण काल की अध्ययन से हमें अग्नि और पहिए के आविष्कार ने मानव जीवन में जो क्रांतिकारी परिवर्तन किए उनके बारे में जानकारी प्राप्त हुई। हड़प्पा सभ्यता के अध्ययन से हमें योजनाबद्ध ढंग से नगरों के निर्माण का ज्ञान प्राप्त हुआ। वेदों के अध्ययन से हमें जीवन के उद्देश्य के बारे में आयुर्वेद और संगीत कला की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई। कोटिल्य के अर्थशास्त्र से हमें राजनीति के आदेशों के बारे में पता चला।

 

अशोक की कलिंग लड़ाई से हमें पता चला कि युद्ध केवल विनाश लाता है, युद्ध हम किसी के दिल को नहीं जीत सकते। महात्मा बुद्ध के जीवन से ज्ञात हुआ कि संसार दुखों का घर है। अलाउद्दीन खिलजी ने सिकंदर महान की असफलता को देखकर विश्व विजय की योजना का परित्याग किया था। अकबर ने दिल्ली सुल्तानों की असफलता को देखते हुए राजपूतों से मैत्री पूर्ण संबंध बनाना आवश्यक समझा। आज कोई भी देश है हिटलर तथा मुसोलिनी का अनुकरण नहीं करना चाहता। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान परमाणु अस्त्रों ने जो विनाश फैलाया उसको देखते हुए आज कोई भी राष्ट्र इनके प्रयोग की कल्पना भी नहीं कर सकता‌।

 

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास ज्ञान पर आधारित है, इतिहास विज्ञान की शाखा है, इतिहास से हमें बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

 

5. संपूर्ण इतिहास विचारधारा का इतिहास होता है:- प्रसिद्ध विद्वान R G कालिंगवुड अपने सर्वाधिक प्रसिद्ध वाक्यांश में कहते हैं, “संपूर्ण इतिहास विचारधारा का इतिहास होता है।” प्रसिद्ध लेखक रेनियर के अनुसार “इतिहास सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्य के अनुभवों की कहानी है।” क्या इतिहास विचार ही इतिहास होता है यह अवधारणा विद्वानों के बीच विवाद का विषय बनी हुई है।



 

6. संपूर्ण इतिहास समसामयिक होता है:- महान इटालियन दर्शनिक क्रोचे के अनुसार, “संपूर्ण इतिहास समसामयिक इतिहास होता है।” इससे अभिप्राय है कि प्रत्येक वर्तमान इतिहासकार अतीत का अपनी दृष्टि से अवलोकन करता है, वह अतीत को उस रूप में नहीं देखता जिस रूप में वह था, वह वर्तमान की समस्याओं के प्रकाश में अतीत को देखता है वास्तव में इतिहासकार का मुख्य कार्य विवरण देना नहीं अपितु मूल्यांकन करना है। यदि वह मूल्यांकन न करें तो उसे कैसे पता चलेगा कि क्या लिखना है? इतिहास की विषय वस्तु वर्तमान समय और वर्तमान जीवन से संबंधित है इसलिए इतिहास सदैव समसामयिक होता है।

 

7. इतिहास अतीत एवं वर्तमान के बीच एक सेतु है:- मनुष्य चिंतनशील प्राणी है, पशु पक्षी को भविष्य की चिंता नहीं होती है पर मनुष्य जो कुछ सोचता है या करता है उसके पीछे भावी पीढ़ी की सुखद भविष्य की कल्पना काम करती है। भारतीय ऋषियों ने वेदों, महाकाव्यों तथा इतिहास की रचना स्वंय के सुखों के लिए नहीं अपितु भावी पीढ़ी के सुखद भविष्य के लिए की थी। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू आदि ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान इन यातनाओं को जेला उसका उद्देश्य भावी पीढ़ी का भविष्य तथा भारत के लिए स्वतंत्रता प्राप्त करना था। अतः इतिहास अतीत और वर्तमान के मध्य एक सेतु का कार्य करता है। इतिहासकार अतीत का अवलोकन इसलिए करता है ताकि वर्तमान के लिए उपयोगी हों।

इतिहास क्या है?
इतिहास क्या है?

दोस्तों अभी तक आपने पढ़ा की इतिहास क्या है? इतिहास की क्या परिभाषा है? इस बारे में अलग-अलग इतिहासकार ने अपने अलग-अलग मत को प्रस्तुत किया है।

 

अब हम पढ़ने वाले हैं कि इतिहास का क्या महत्व है और इतिहास को पढ़ना क्यों जरूरी है?

 

1. प्राचीन संस्कृतियों की जानकारी:- प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन से हमें यह जानकारी मिलती है कि भारत में प्राचीन संस्कृतियों की उत्पत्ति और विकास किस प्रकार हुआ है? पाषाणकालीन भारतीय मानव को किन समस्याओं से जूझना पड़ा और उन पर उसने कैसे विजय प्राप्त की? उन्होंने खानाबदोशी जीवन को छोड़कर स्थाई जीवन कैसे शुरू किया? उन्होंने कृषि का आरंभ कैसे किया? वह कौन-कौन सी फसलें पैदा करते थे? उन्होंने पशुपालन द्वारा कौन-कौन से लाभ प्राप्त किए?

इतिहास क्या है?
इतिहास क्या है?

उनके औजार कैसे होते थे? तथा वह किन चीजों से बने होते थे? वह कैसे वस्त्र पहना करते थे? और कहां पर रहते थे? उनके धार्मिक विश्वास क्या थे? वह कला में क्या दिलचस्पी रखते थे? अग्नि तथा पहियों के आविष्कारों ने उनके जीवन में कौन से क्रांतिकारी परिवर्तन किए? उन्होंने किस धातु का प्रयोग किया? मानव किस प्रकार प्रगति के रास्ते पर धीरे-धीरे आगे बढ़ा? मनुष्य किस प्रकार विशाल राज्यों की स्थापना की? प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन से हमें पता चलता है कि किस प्रकार विभिन्न सभ्यताओं (हड़प्पा, आर्य, मौर्यवंश, गुप्त वंश आदि ने भारतीय संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया।

 

2. मानव प्रजातियों का संगम:- प्राचीन भारत का इतिहास एक अन्य दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है, उस समय यह अनेक मानव प्रजातियों का संगम स्त्रोत रहा है, यहां आर्य, यूनानी, इरानी, कुषाण, शक, हुण, अरब तथा तुर्क आदि आकर बस गए। हर प्रजाति ने भारतीय शिल्प कला, वास्तुकला और साहित्य के विकास में अपना अपना योगदान दिया। उन्होंने यहां की स्त्रियों से विवाह करवा लिया। धीरे-धीरे वे लोग यहां के समाज में ही घुल मिल गए अतः उनकी अलग पहचान समाप्त हो गई।

 

3. विभिन्न भाषाओं और लिपियों के साथ संबंध:- आधुनिक भारत में जो विभिन्न भाषाएं एवं लिपियां प्रचलित है उनका संबंध प्रत्यक्ष रूप से प्राचीन काल में प्रचलित भाषाओं और लिपियों से हैं। संस्कृत जो प्राचीन काल में आर्यों की भाषा थी से हिंदी, गुजराती, मराठी, बांग्ला आदि उत्तरी भारत की अनेक भाषाएं उत्पन्न हुई है। दक्षिण भारत में प्रचलित भाषाएं तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम पर संस्कृत भाषा का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी प्रकार आधुनिक लिपियों का विकास प्राचीन काल में प्रचलित लिपियों से हुआ है, आज देश को भाषा की दृष्टि से एक सूत्र में बांधने के जो प्रयास किए जा रहे हैं उसकी प्ररेणा भी हमें प्राचीन काल के भारतीय इतिहास से प्राप्त हुई है। मौर्य काल में प्राकृत भाषा तथा गुप्त काल में संस्कृत भाषा ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया गया था।

 

4. विभिन्न धर्मों की जन्मभूमि:-

महात्मा बुद्ध
महात्मा बुद्ध

प्राचीन काल में भारत विभिन्न धर्मों की जन्मभूमि रहा है। हिंदू धर्म, जैन धर्म, तथा बौद्ध धर्म यहां के प्रमुख धर्म थे। इन सभी धर्मों के लोग सदैव एक साथ मिलकर रहा करते थे। भारत के विभिन्न शासकों ने सदा धार्मिक सहनशीलता की नीति का अनुसरण किया, उन्होंने कभी भी अपने धर्म को प्रजा पर थोपने का प्रयास नहीं किया। आज भारत में संप्रदायक झगड़ों का जो विकराल रूप देखने को मिल रहा है उसका मूल कारण धर्म है, यदि आज भारत प्राचीन काल भारत में प्रचलित धार्मिक सहनशीलता की नीति का अनुसरण कर ले भारत की प्रगति के मार्ग में आने वाली बाधा दूर हो जाए।

 

5. लोकतंत्रीय संस्थाएं:- प्राचीन काल में भारत में लोकतंत्रीय संस्थाओं का प्रचलन था। ऋग्वैदिक काल में “सभा” तथा “समिति” नामक दो संस्थाएं प्रचलित थी। इन्हें बहुत सी शक्तियां प्राप्त थी वह राजा को शासन प्रबंध चलाने में सलाह देती थी। राजा उनके इच्छा अनुसार ही शासन चलाया करता था, अन्यथा ये संस्थाएं उसी गद्दी से उतार सकती थी। प्राय: भारतीय शासकों की यह परंपरा रही है कि वह प्रजा के हितों को ध्यान में रखकर अपना शासन चलाते थे, न्याय करते समय भी किसी का पक्ष नहीं लेते थे। गांव में पंचायतें झगड़ों का फैसला करती थी, लोग पंचों को परमेश्वर समझकर प्राय उनका फैसला मान लेते थे। केंद्रीय सरकार उनके मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्राचीन काल से ही भारतीय लोकतान्त्रिक संस्थाओं को लोग बहुत महत्व देते थे।

 

6. कला और वास्तुकला:-

पूर्व ऐतिहासिक काल कला
कला

प्राचीन कालीन भारत ने कला और वास्तुकला के क्षेत्रों में आश्चर्यजनक उन्नति की थी। हड़प्पावासी योजना पूर्ण नगर बनाने में कुशल थे, उस काल में बनी कांसे की नर्तकी की मूर्ति तथा विभिन्न प्रकार के मुहरें उनकी श्रेष्ठ कला का प्रमाण है। चीनी यात्री फाह्यान पाटलिपुत्र में बने अशोक के महल को देखकर चकित रह गया था, उसका कहना था कि यह महल मनुष्य ने नहीं अपितु देवताओं ने बनाया है। अशोक द्वारा बनवाई गए विशाल स्तंभ, और उन पर की गई पॉलिस और शीर्ष पर बनाई गई पशुओं की मूर्तियां मौर्य काल की कला का उत्तम उदाहरण है। निसंदेह प्राचीन काल की कला वास्तुकला ने भावी पीढ़ियों को प्रोत्साहित किया। प्राचीन काल की कला और वास्तुकला की जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें इतिहास का पढ़ना और इस का बारीकी से अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है।



 

7. साहित्य का विकास:- प्राचीन काल में भारत ने साहित्य के क्षेत्र में बहुत विकास किया। इस काल में सबसे अधिक संस्कृत साहित्य लिखा गया। इस साहित्य के विकास में आर्यों ने सबसे बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने ने केवल चार वेदों ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, तथा अर्थवेद, की रचना की। अपितु ब्राह्मणों, उपनिषदों, वेदांगो, उपवेदों, पुराण, तथा महाकाव्य आदि को भी लिखा। मौर्य काल में कोटिल्य द्वारा लिखा गया अर्थशास्त्र एक बहुमूल्य रचना है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

गुप्त काल को संस्कृत का स्वर्ण युग कहा जाता है। कालिदास इस काल का सबसे महान लेखक था जिसे आज भी “भारतीय शेक्सपियर” के नाम से याद किया जाता है। उसके द्वारा लिखा गया शकुंतला बहुत प्रसिद्ध हुआ। कन्नौज के शासक हर्षवर्धन ने भी संस्कृत साहित्य को अपना संरक्षण प्रदान किया। दक्षिण भारत में अधिकतर साहित्य तमिल भाषा में लिखा गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि यह दक्षिण भारत की सबसे प्राचीन भाषा है। इस प्रकार प्राचीन साहित्य की जानकारी के लिए इतिहास का अध्ययन करना हमारे लिए जरूरी हो जाता है।

 

8. विज्ञान का विकास:- प्राचीन काल में भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की आर्यभट्ट ने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी अपने अक्ष के चारों ओर घूमती है तथा यह बतलाया कि ग्रहण कैसे लगता है? ब्रह्मगुप्त ने न्यूटन से शताब्दियों पहले यह ज्ञात किया कि सभी वस्तुएं प्रकृति के नियम अनुसार पृथ्वी पर गिरती है, क्योंकि पृथ्वी की यह विशेषता है कि यह वस्तु को अपनी ओर खींचती है, इसे आकर्षण शक्ति का सिद्धांत कहते हैं। गुप्त काल में गणित के क्षेत्र में असाधारण विकास हुआ। आर्यभट्ट ने शून्य का आविष्कार करके गणित के क्षेत्र में एक नई क्रांति ला दी, उसने गणित को एक स्वतंत्र विषय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया‌ प्राचीन काल में चिकित्सा के क्षेत्र में भी भारत ने आश्चर्यजनक प्रगति की थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्राचीन काल इतिहास में विज्ञान के विकास में बहुत सारे लोगों ने अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

 

9. विविधता में एकता:- प्राचीन काल में भारत एक बहुत विशाल देश था। अतः यहां भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा कला एवं संस्कृति में विविधता पाई जाती थी। परंतु यह भारत की विशेषता रही है कि यहां शताब्दियों तक विभिन्न धर्म एवं संस्कृति के लोगों का पारस्परिक मिश्रण होता रहा है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक और पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में सिंधु तक के विशाल उपमहाद्वीप को एक देश कहा गया और उसे भारत नामक एक प्राचीन राजवंश के आधार पर भारत वर्ष का नाम दिया गया। समस्त देश पर शासन करने वाले शासकों को चक्रवर्ती कहा जाता था, इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बहुत सारी विविधता होने के बाद भी भारत में एकता थी।

 

10. वर्ण व्यवस्था:- प्राचीन काल भारत की एक महत्वपूर्ण विशेषता उत्तरी भारत के समाज में वर्ण व्यवस्था (जाति प्रथा) का उदय था। वैदिक काल में भारतीय समाज चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र में विभाजित था। शुरुआत में यह वर्ण व्यवसाय के आधार पर बंटे थे, पर बाद में जन्म को इसका आधार माना जाने लगा। धीरे-धीरे यह प्रथा सारे देश में फैल गई। प्राचीन काल से अनेक विदेशी जातियां भारत में आकर बस गई। वह गुणों के आधार पर किसी ने किसी वर्ण में सम्मिलित हो गई। बाद में अनेक हिंदू मुस्लिम तथा इसाई धर्म में शामिल हो गए थे परंतु उन्होंने अपने पुराने रीति रिवाजों को नहीं छोड़ा।

 

11. उज्जवल भविष्य के लिए:- प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास का अध्ययन भारत के उज्जवल भविष्य के लिए अति आवश्यक है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा अतीत गौरवमयी था। हमारे पूर्वजों ने अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की। वे हमारी शक्ति का स्रोत है, परंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्राचीन कालीन भारतीय समाज में अनेक त्रुटियां थी। शूद्रों और चांडालो के साथ बहुत ही अपमानजनक व्यवहार किया जाता था। नारी को पुरुष की दासी समझा जाता था। कन्यावध, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह, पर प्रतिबंध तथा दहेज प्रथा आदि ने स्त्रियों का जीवन दूभर बना दिया था। लोगों में बहुत सारे अंधविश्वास फैले हुए थे। अतः जो लोग भारत के उज्जवल भविष्य का निर्माण चाहते हैं उन्हें अतीत की इन बुराइयों को दूर करना होगा।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

दोस्तों इस लेख में हमने जाना कि इतिहास क्या होता है? इतिहास की क्या परिभाषा होती है? इतिहास का क्या महत्व है? और हमको इतिहास का अध्ययन करना क्यों जरूरी है? यदि यह लेख आपको पसंद आया हो तो आप इसे शेयर जरूर करें, और कमेंट करके बताएं कि आपको यह लेख कैसा लगा और ऐसे ही लेख पाने के लिए हमारी वेबसाइट को सब्सक्राइब कर ले।

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