प्राचीन इतिहास के स्त्रोत | Source Of Ancient History |

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किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति को भली-भांति समझने के लिए उसके ऐतिहासिक स्रोतों को जानना अति आवश्यक है। दुर्भाग्यवश प्राचीन इतिहास के स्रोत बहुत कम है। इन स्रोतों में जो जानकारी प्रदान की गई है वह बहुत अस्पष्ट और अधूरी है‌। इसलिए हमें प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास के निर्माण में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

किंतु अनेक इतिहासकारों तथा पुरातत्ववेताओं ने अपने अथक परिश्रम से इतिहास के अन्य स्रोतों का पता लगाया है। इन स्रोतों के आधार पर हम प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश डाल सकते हैं। हमें जो प्राचीन इतिहास के स्रोत प्राप्त हुए हैं उन्हें हम चार मुख्य भागों में विभाजित कर सकते हैं। यह स्त्रोत निम्नलिखित प्रकार के हैं।

 

1. धार्मिक साहित्य
2. लौकिक साहित्य
3. विदेशियों के वृतांत
4. पुरातत्व सबंधी स्रोत

 

1. धार्मिक साहित्य

भारतवर्ष शुरू से ही धर्म प्रधान देश रहा है। भारतीयों के लिए धर्म जीवन का एक अमूल्य आदर्श था। अतः यह नितांत स्वाभाविक था कि भारत में जिस साहित्य की रचना हुई। उसमें धार्मिक साहित्य को प्रमुख स्थान प्राप्त था। धार्मिक साहित्य में सर्वाधिक साहित्य हिंदुओं द्वारा लिखित है। इसके अतिरिक्त बौद्ध तथा जैनियों ने भी अपने अपने धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इसमें कोई संदेह नहीं कि इन ग्रंथों की रचना का मुख्य धार्मिक ही था, किंतु इनके गहन अध्ययन से हमें तत्कालीन लोगों की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दशा के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है।

(क) हिंदू साहित्य:- भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता को हिंदुओं अथवा आर्यों की सबसे महत्वपूर्ण देन वैदिक साहित्य थी। वैदिक साहित्य को रचना काल के आधार पर दो भागों में बांटा जा सकता है 1. प्रारंभिक वैदिक काल का साहित्य 2. उत्तर वैदिक काल का साहित्य।

 

प्रारंभिक वैदिक काल का साहित्य

 

प्रारंभिक वैदिक काल में चार वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद आदि को शामिल किया गया है। इस साहित्य को श्रुति भी कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना मनुष्य के द्वारा नहीं अपितु ईश्वर के बताने पर ऋषियों के द्वारा की गई। इसलिए इस साहित्य को ईश्वरीय ज्ञान का भंडार माना जाता है।




 

1. चार वेद:- वेद शब्द ‘विद’ धातु से निकला है जिसका अर्थ है जानना अथवा ज्ञान। अन्य शब्दों में वेदों को आर्यों के ज्ञान का भंडार कहा जाता है। वेदों की संख्या चार है। 1.ऋग्वेद 2.सामवेद 3.यजुर्वेद और 4.अर्थ वेद।

(क) ऋग्वेद:- ऋग्वेद आर्यों का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण वेद है। जिसकी रचना 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व में हुई। यह वह समय था जब आर्य पंजाब में रहते थे। ऋग्वेद में 1028 सूक्त है जिन्हें 10 मंडलों में विभाजित किया गया है। ऋग्वेद में सर्वाधिक 250 मंत्र इंद्र देवता की प्रशंसा में दिए गए हैं। शेष मंत्र वरुण, अग्नि, सूर्य तथा अन्य देवी-देवताओं को समर्पित है। यह सभी देवी देवता प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक है। ऋग्वेद में विख्यात गायत्री मंत्र है जिसे हिंदू आज भी प्रतिदिन पढ़ते हैं।

 

(ख) सामवेद:- साम शब्द से अभिप्राय मधुर गीत से हैं और सामवेद को मधुर गीतों का एक संग्रह माना जाता है। इस वेद में केवल 75 नए मंत्र है और शेष सभी मंत्र ऋग्वेद में से लिए गए हैं। इन मंत्रों को यज्ञ के समय पुरोहित सुर और ताल सहित गाते थे। इसी कारण इस वेद को भारतीय संगीत कला का स्त्रोत कहा जाता है।

 

(ग) यजुर्वेद:- यजुर्वेद में यज्ञो के समय पढ़े जाने वाले मंत्र दिए गए हैं। इसमें यज्ञ करने की विधि भी बताई गई है। यह वेद दो भागों शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद में विभाजित है। शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्रों का वर्णन है। जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ साथ उनके अर्थ भी प्रस्तुत किए गए हैं। इस वेद से हमें आर्यों के सामाजिक जीवन के संबंध में भी बहुत महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

 

(घ) अर्थवेद:- यह वेद शेष तीन वेदों से अलग है। इसमें 731 सूक्त प्रस्तुत किए गए हैं और यह 20 मंडलों में विभाजित है। यह जादू टोनो के मंत्रों का संग्रह है। इसमें भूतों और चुड़ैल को वश में करने की विधियां बताई गई है। इसमें बहुत सी बीमारियों से बचाव के लिए औषधियों का भी वर्णन किया गया है।

 

2. ब्राह्मण ग्रंथ:- ब्राह्मण ग्रंथों की रचना वेदों के बाद हुई। यह ग्रंथ वेदों की सरल व्याख्या करने के लिए रचित किए गए, ताकि सामान्य जन उनका अर्थ समझ सके। ग्रंथों में विख्यात व्यक्तियों की वीरता पूर्ण कारनामों का भी वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ गद्द में लिखित है। प्रत्येक वेद के अलग-अलग ब्राह्मण हैं। इनके अध्ययन से केवल यज्ञों की विधियों का ज्ञान नहीं होता अपितु तत्कालीन इतिहास के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

3.अरणायक:- अरणायक का शाब्दिक अर्थ है वन। यह ब्राह्मण ग्रंथों का ही भाग है। यह वनों में निवास करने वाले साधू के लिए लिखित थे । इनमें आध्यात्मिक विषयों और नैतिक मूल्य पर अधिक बल दिया गया है और यज्ञ एवं कांडों के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया।

 

4. उपनिषद:- उपनिषद को यदि भारतीय दर्शन का मूल स्त्रोत कहा कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उपनिषदों की कुल संख्या 108 हैं और इनकी रचना अलग अलग ऋषियों के द्वारा की गई है। इनमें जीवन और मृत्यु से संबंधित बहुत से भेदों का समाधान करने का यत्न किया गया है।

 

इनमें यह बताने का प्रयास किया गया है कि आत्मा क्या है? इसका ईश्वर से क्या संबंध है? इनमें कर्म, मोक्ष, माया व आवागमन के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या की गई है, क्योंकि उपनिषद वैदिक साहित्य का अंतिम रूप है इसलिए उन्हें वेदांत भी कहा जाता है।



 

उत्तर वैदिक काल का साहित्य

 

उत्तर वैदिक कालीन साहित्य में वेदांग, सूत्र, वेद, पुराण, धर्मशास्त्र, षट दर्शन और महाकाव्य आदि सम्मिलित है। इस साहित्य को समृति भी कहा जाता है क्योंकि इसकी रचना ऋषियों ने अपने ज्ञान के द्वारा की।

1. वेदांग:- वेदांग वेदों का ही अंग है। इनकी संख्या 6 है और यह अलग-अलग विषयों से संबंधित है। इनके नाम शिक्षा, छंद, कल्प, व्याकरण, निरुक्त और ज्योतिष है। इनमें यह कल्प वेदांत सबसे महत्वपूर्ण है। जिसमें आर्यों के धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है। वेदों को समझने के लिए तथा उनका सही उच्चारण करने के लिए वेदांगों का विशेष महत्व है।

 

2. सूत्र:- उत्तर वैदिक काल में साहित्य रचना की एक नई शैली का सूत्रपात हुआ। इन्हे सूत्र कहा जाता था। इनमें कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक बातें कहने का प्रयास किया गया है। इसका उद्देश्य यह था कि लोग वैदिक साहित्य को सरलता पूर्वक स्मरण कर सके।

 

इन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है।

 

1. स्त्रोत सूत्र- इनमें यज्ञों, बलि और अन्य धार्मिक रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है।

2. ग्रह सूत्र- यह सूत्र सभी सूत्रों से महत्वपूर्ण है। इसमें जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी परिवारिक अनुष्ठानों का विधि-विधान वर्णन किया गया है।

3. धर्मसूत्र:- इसमें आर्यों के प्रचलित सामाजिक नियमों का वर्णन किया गया है।

 

3. उपवेद:- उपवेद सहायक वेद है। इनकी संख्या 4 है।

 

क). आयुर्वेद इसमें औषधियों का वर्णन किया गया है।

ख). धनुर्वेद- इसमें युद्ध कला का वर्णन किया गया है।

ग). गंधर्व वेद- इसमें संगीत से संबंधित विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

घ). शिल्प वेद इसमें कला और भवन निर्माण कला से संबंधित जानकारी प्रदान की गई है।

4. धर्मशास्त्र:- धर्मशास्त्र दीवानी और फौजदारी कानून से संबंधित ग्रंथ है। मनु, विष्णु, नारद नामक धर्मशास्त्र सुविख्यात है। धर्म शास्त्र में मनु स्मृति सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण शास्त्र है। इसमें मनुष्य जीवन के चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास का तथा प्रत्येक आश्रम से संबंधित कर्त्तव्यों का बहुत विस्तृत वर्णन किया गया है।

 

धर्मशास्त्र प्राचीन काल भारत में प्रचलित विवाह, तलाक, संपत्ति, साझेदारी, उत्तराधिकारी इत्यादि से संबंधित हिंदू कानूनों और अपराधियों को दिए जाने वाले ढंड और न्याय व्यवस्था को जानने के लिए हमारा मुख्य स्रोत है।

 

5. पुराण:- पुराणों की भाषा संस्कृत है। यह भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। इनकी कुल संख्या 18 है। इनका संकलन लगभग 500 ईसा पूर्व से लेकर 500 ईसवी के मध्य हुआ। प्रत्येक पुराण के पांच-पांच भाग हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से पुराणों का पांचवा भाग सबसे महत्वपूर्ण है। पुराणों में वायु पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भगवत पुराण बहुत विख्यात है। पुराणों से हमे शिशुनाग, नंद, मौर्य, सातवाहन, शुंग तथा गुप्त शासकों के संबंध में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है।

 

इनसे हमें प्राचीन नगरों, नदियों तथा पर्वतों तथा हिंदू देवताओं देवी-देवताओं के संबंध में भी महत्वपूर्ण तथ्य प्राप्त होते हैं। पुराणों में कुछ गंभीर दोष भी हैं। इनमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ काल्पनिक कथाओं का मिश्रण इस प्रकार कर दिया गया है कि दोनों को अलग करना अत्यंत कठिन है। इनमें दी गई अनेक तिथियां तथा नाम भी ठीक नहीं है। अतः पुराणों का उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
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6. षट् दर्शन:- उत्तर वैदिक काल में अलग-अलग ऋषियों ने भारतीय दर्शन से संबंधित छह शास्त्र लिखे हैं। इन्होंने आत्मा परमात्मा और जीवन मृत्यु से संबंधित अलग-अलग पहलुओं पर भरपूर प्रकाश डाला। वास्तव में यह शास्त्र एक ऐसे दर्पण की तरह है जिसमें भारतीय दर्शन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

 

7. महाकाव्य:- रामायण और महाभारत

उत्तर वैदिक काल के दो विख्यात महाकाव्य है। रामायण की रचना महर्षि बाल्मीकि ने की थी। इसमें 24,000 श्लोख है। रामायण का मुख्य विषय रामचंद्र और रावण के बीच युद्ध है। महाभारत भारत का सबसे बड़ा महाकाव्य है।इसमें एक लाख से अधिक श्लोक है। इसकी रचना महर्षि वेद व्यास ने की थी। श्री भगवत गीता भी महाभारत का ही एक भाग है। महाभारत का मुख्य विषय पांडव और कौरव के बीच युद्ध है। ये दोनों महाकाव्य 1000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व लोगों की धार्मिक राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।

 

(ख) बौद्ध साहित्य

वैदिक साहित्य की तरह बौद्ध साहित्य भी काफी विस्तृत है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से बौद्ध साहित्य का बहुत महत्व है। बौद्ध साहित्य की रचना पाली तथा संस्कृत भाषाओं में की गई है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
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1. त्रिपिटक:- त्रिपिटक बौद्ध धर्म के सबसे प्राचीन ग्रंथ है। पिटक का अर्थ है- ‘टोकरी’ जिसमें इन ग्रंथों को संभाल कर रखा जाता था। त्रिपिटकों के नाम सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्मपिटक है। यह पाली भाषा में लिखित है। त्रिपिटकों के अध्ययन से हमें केवल बौद्ध धर्म के संबंध में ही नहीं अपितु तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के संबंध में काफी मूल्यवान जानकारी प्राप्त होती है।



 

2. जातक:- जातक कथाओं को बौद्ध साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इनकी कुल संख्या 549 है तथा यह पाली भाषा में लिखे गए हैं। इन कथाओं में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों का वर्णन किया गया है। यह जातक कथाएं ईसा पूर्व तीसरी सदी से दूसरी सदी तक की भारतीय समाज की धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दशा का सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है।

 

3. मिलिंद पन्हो:- इस ग्रंथ में जो 100 ईसा पूर्व में लिखा गया था, में एक यूनानी शासक के मीनाण्दर तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य हुए धार्मिक वालों वार्तालाप का विवरण दिया गया है। इस ग्रंथ से हमें मीनाण्दर के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

 

4. कथावथु:- इस महत्वपूर्ण ग्रंथ को 251 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में आयोजित की गई बौद्धों की तीसरी महासभा में मोगग्लीपुत्त तिस्स जो कि सभापति था, द्वारा लिखा गया था। इससे हमें राजा अशोक के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती हैं।

 

5. बुद्धचरित, सौंदरानंद तथा महाविभास:- ये तीनों बौद्ध धर्म के विख्यात ग्रंथ हैं। बुद्ध चरित तथा सौंदरानंद की रचना अश्वघोष ने की थी। महाविभास का लेखक वासूमित्र था। यह तीनों ग्रंथ कनिष्क के समय लिखे गए थे। अतः इन ग्रंथों से कुषाण वंश के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

 

6. दीपवंश तथा महावंश:- इन दोनों बौद्ध ग्रंथों की रचना लगभग 5वीं शताब्दी में श्रीलंका में की गई थी। ऐतिहासिक दृष्टि से महावंश, दीपवंश की अपेक्षा कहीं अधिक प्रमाणिक है। इन बौद्ध ग्रंथों से हमें मोर्य काल के इतिहास तथा भारत के श्रीलंका के साथ संबंधों के बारे में काफी ज्ञान प्राप्त होता है।

 

(ग) जैन साहित्य

 

जैन साहित्य भी प्राचीन भारतीय इतिहास की अनेक धुंधले पक्षों पर प्रकाश डालता है। जैन साहित्य के 12 अंग सबसे विशाल है। इनमें महावीर के सिद्धांतों तथा जैन भिक्षुओं के नियमों संबंधी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों से हमें जैन धर्म के अतिरिक्त उस समय के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन का वर्णन मिलता है। भद्रबाहु का कल्पसूत्र तथा हेमचंद्र सूरी का त्रिष्टीशकाला पुरुष सूत्र ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
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2. लौकिक साहित्य

लौकिक साहित्य से अभिप्राय धर्मनिरपेक्ष साहित्य से हैं। इसमें व्याकरण, नाटक, काव्य, ऐतिहासिक, राजनीतिक तथा अर्धऐतिहासिक ग्रंथ सम्मलित है। इन प्रमुख ग्रंथों का प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में बहुमूल्य योगदान है। यह ग्रंथ भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर भी पर्याप्त प्रकाश डालते हैं।

 

1. अष्टाध्यायी और महाभाष्य:- अष्टाध्यायी का लेखक पाणिनी और महाभाष्य का लेखक पंतजलि था। यह दोनों ग्रन्थ प्राचीन काल भारत के विख्यात व्याकरण के ग्रंथ हैं। इन ग्रंथों से हमें कहीं कहीं उस समय की आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक दशा के विषय में भी अमूल्य वर्णन मिलता है।

 

2. अर्थशास्त्र:- अर्थशास्त्र का लेखक कौटिल्य था, वह चंद्रगुप्त मौर्य का गुरु तथा प्रधानमंत्री था। वह अपने समय का एक महान विद्वान था। उसके द्वारा लिखे अर्थशास्त्र को प्राचीन भारत की एक अदितीय रचना माना जाता है। इसकी तुलना मैक्यावली की प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि प्रिंस‘ से की जाती है। यह 15 खंडों में विभाजित है। अर्थशास्त्र से हमें मोर्य कालीन शासन प्रबंध तथा लोगों की आर्थिक दशा के बारे में बहुत ही उपयोगी जानकारी मिलती है।

 

3. मुद्राराक्षस तथा देवीचंद्रगुप्तम:- यह दोनों ऐतिहासिक नाटक थे। इनके लेखक का नाम विशाखदत्त था। मुद्राराक्षस में यह वर्णन किया गया है कि किस प्रकार चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश का अंत करके मौर्य वंश की स्थापना की। देवीचंद्रगुप्तम नाटक में गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की महान सफलताओं का वर्णन किया गया है।

 

4. रत्नावली, प्रियदर्शिका तथा नागानंद:- यह तीनों विख्यात नाटक हर्षवर्धन द्वारा लिखित हैं। इनके अध्ययन से हमें सातवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास के संबंध में उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
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5. राजतरंगिणी- प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास से संबंधित साहित्यिक स्रोतों में से राजतरंगिणी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसकी रचना 12वीं शताब्दी में कल्हण ने की थी। इसमें प्रारंभ से लेकर 12वीं सदी के मध्य तक के कश्मीर के इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह स्त्रोत बहुत बहुमूल्य है।

 

3. विदेशियों के वृतांत

प्राचीन काल में समय-समय पर अनेक विदेशी विद्वानों यूनानी, चीनी, रोमन, तिब्बती तथा मुसलमानों ने भारत की यात्रा की। इन विद्वानों ने जो कुछ अपनी आंखों से देखा अथवा जो अनुभव प्राप्त किया उसके आधार पर अपने यात्रा विवरण अथवा लेख लिखें। इन विवरणों को हम पूर्णत विश्वसनीय नहीं मान सकते। इसका कारण यह है कि यह विद्वान भारतीयों की भाषा तथा रीति रिवाजों से बिल्कुल अलग थे।

 

उन्होंने अनेक सुनी सुनाई बातें भी लिख दी। जिन पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अनेक घटनाओं का पूर्ण विवरण उपलब्ध नहीं हो सका। इन दोषों के बावजूद यह विदेशी वृतांत प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास के निर्माण में बहुमूल्य सिद्ध हुए हैं क्योंकि यह किसी धार्मिक भावना से प्रेरित होकर नहीं लिखे गए।

 

1. हेरोडोट्स– हेरोड्टस को विश्व का प्रथम इतिहासकार माना जाता है। उसने “हिस्टोरिका” नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें यूनानी शासक के डेरियस द्वारा भारत पर आक्रमण तथा भारत की उत्तर पश्चिमी राजनीतिक स्थिति का वर्णन दिया गया है।

 

2. मेगस्थनीज:- मेगस्थनीज यूनानी शासक के सेल्यूकस की ओर से चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में 302 ईसा पूर्व से 298 ईसा पूर्व तक राजदूत रहा था। उसने इंडिका नामक विख्यात ग्रंथ की रचना की। इसमें उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य, उसके दरबार, उस के शासन प्रबंध तथा उस समय की सामाजिक तथा आर्थिक दशा का बहुमूल्य वर्णन किया है। यद्यपि इसमें कुछ दोष भी है किंतु यह मौर्य काल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। दुर्भाग्यवश यह ग्रंथ गुम हो चुका है। बाद में यूनानी लेखको ने इसके अपने लेखों में इसके उदाहरण दिए हैं।

 

3. डिमेकस:- वह मौर्य शासक बिंदुसार के दरबार में यूनानी राजदूत था। उसने अपने वृतांत में मौर्य काल के लोगों के जीवन पर प्रकाश डाला है।

 

4. टालमी:- उसने अपने ज्योग्राफी में भारत के भूगोल का वर्णन किया है। यद्यपि इसमें उसने भारत का मानचित्र अशुद्ध दिया है। किंतु यह एक उपयोगी ग्रंथ है।



 

5. फाह्यान:- वह प्रथम चीनी यात्री था। जो चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। वह भारत में 405 ई० से 411 ई० तक रहा था। उसका भारत आने का उद्देश्य बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन करना था। उसने अपनी यात्रा के दौरान अपनी आंखों से जो देखा उसका अपने वृतांत में वर्णन किया है।

 

6. ह्युनसांग:- वह भारत आने वाला दूसरा विख्यात चीनी यात्री था। वह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया। वह भारत में 630 ईस्वी से 644 ईसवी तक रहा। वह 8 वर्षों तक हर्षवर्धन के दरबार में रहा। उसे यात्रियों का राजकुमार कहा जाता है। ह्युनसांग ने अपनी भारत यात्रा का वर्णन अपने प्रसिद्ध ग्रंथ सी-यू-की में किया है। उनके इस वृतांत से हमें हर्षवर्धन के शासनकाल में अमूल्य जानकारी प्राप्त होती है।

 

7. रोमन स्त्रोत:- रोम इटली की राजधानी थी। यहां से अनेक यात्री भारत आए। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध पिलनी था। वह पहली सदी ईस्वी में भारत आया था। उसने “नेचुरलिस हिस्टोरीका” नामक पुस्तक की रचना की। यह लेटिन भाषा में है। इससे हमें भारत तथा रोम के मध्य होने वाले व्यापार के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

8. तिब्बती स्त्रोत:- तिब्बत के लेखकों में तारानाथ का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है। उसने अपनी पुस्तक “बौद्ध धर्म का इतिहास” में बौद्ध धर्म संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। क्योंकि उसका विवरण पक्षपात पूर्ण है। इसलिए उसका प्रयोग सतर्कता से करना चाहिए।

 

9. मुस्लिम स्त्रोत:- प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने में मुस्लिम लेखको के वृत्तांत बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। आठवीं शताब्दी में अरबों के सिंध आक्रमण तथा 11 वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत पर आक्रमण के समय अनेक मुस्लिम विद्वान भारत आए। उन्होंने अपने विवरणों में तत्कालीन भारत की राजनीतिक सामाजिक आर्थिक तथा धार्मिक दशा का विस्तृत वर्णन किया है

 

4. पुरातत्व सबंधी स्रोत।

पुरातत्व संबंधी स्त्रोतों ने प्राचीन इतिहास के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है। साहित्यिक स्रोतों से यद्यपि अनेक महत्वपूर्ण विवरणों तथा घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है किंतु केवल इन के आधार पर ही प्राचीन काल भारतीय इतिहास की रचना नहीं की जा सकती। इसका कारण यह है कि साहित्यिक स्रोतों में अनेक प्रकार की त्रुटियां हैं। देसी साहित्य में तिथि क्रम का अभाव है।

अधिकांश ग्रंथ धार्मिक भावना से प्रेरित होकर लिखे गए हैं। इनके अतिरिक्त ये स्त्रोत किसी क्षेत्र विशेष की जानकारी प्रदान करते हैं। अतः इन्हें समस्त भारत के इतिहास की जानकारी के उपयोग में नहीं लाया जा सकता। पुरातात्विक संबंधित स्त्रोत एवं मौलिक और विश्वसनीय होने के कारण साहित्यिक स्रोतों की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान है।

 

1. अभिलेख:- प्राचीन काल भारतीय इतिहास की बिक्री हुई कड़ियों को जोड़ने में अभिलेखों का बहुमूल्य योगदान है। अभिलेखों के अध्ययन को पूरालेख शास्त्र कहते हैं‌। प्राचीन काल भारत के अभिलेख मुहरों, गुफाओं तथा मंदिरों की दीवारों, पत्थरों, चट्टानों, से तथा ताम्रपत्र आदि पर अंकित मिलते हैं। यह अभिलेख अनेक भाषाओं में मिलते हैं‌। आरंभिक अभिलेखों की भाषा प्राकृत है तथा यह ईस्वी पूर्व तीसरी सदी के हैं। अशोक के ज्यादातर शिलालेख ब्रह्मी लिपि में है तथा कुछ खरोष्टी लिपि में है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

अभिलेख मुख्यत: दो प्रकार के हैं। यह सरकारी अभिलेख और गैरसरकारी अभिलेख। सरकारी अभिलेख देश के विभिन्न संग्रहालय में सुरक्षित है। इन अभिलेखों में अशोक के शिलालेख सर्वाधिक विख्यात है। सरकारी अभिलेखों के अतिरिक्त बहुत अधिक संख्या में गैर-सरकारी अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं ऐसे अभिलेखों से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, कला तथा साहित्य के विकास का पता चलता है। भारत से बाहर पाए जाने वाले कुछ विदेशी अभिलेख भी भारतीय इतिहास को जानने में हमारी विशेष सहायता करते हैं।

 

2. सिक्के:- प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में सिक्कों की भूमिका प्रशंसनीय है। सिक्कों के अध्ययन को मुद्रा शास्त्र कहते हैं। यह सिक्के सोने, चांदी, तांबे और मिश्रित धातुओं से निर्मित है। इनके आकार में भी भिन्नता है। वैदिक काल के सिक्के को निष्क कहते थे और उत्तर वैदिक काल में निष्क शतमान और कृष्णल नामक सिक्के प्रचलित थे। भारत के प्राचीन सिक्कों को पंचमार्क कहा जाता था।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत सिक्के
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत सिक्के

यूनानियों के भारत आने पर सिक्के के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। हमें मौर्योत्तर काल के सबसे अधिक सिक्के प्राप्त हुए हैं। गुप्त शासकों ने सबसे अधिक सोने के सिक्के जारी किए। भारत की प्रारंभिक सिक्कों पर केवल कुछ एक प्रतीक मात्र ही बनाए मिलते हैं, परंतु बाद में सिक्कों पर राजाओं और देवताओं के नाम तथा तिथि भी उल्लिखित मिलती है।

 

इन सिक्कों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनसे प्राचीनकाल भारतीय इतिहास के संबंध में प्रमाणिक जानकारी प्राप्त होती है। इस जानकारी के आधार पर साहित्यिक स्रोतों में दी गई जानकारी की पुष्टि होती है। सिक्के भारतीय इतिहास की अनेक समस्याओं को सुलझाने में हमारी सहायता करते हैं।

 

प्राचीन काल के भारत में बड़ी संख्या में रोमन सिक्के प्राप्त हुए हैं तथा रोमन साम्राज्य के मध्य व्यापारिक संबंधों का संकेत देते हैं। सिक्कों की धातु से हमें किसी भी काल की आर्थिक दशा का सहजता से अनुमान लग जाता है। यदि सिक्के न होते तो हम प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक राजवंशों के इतिहास पर प्रचूर प्रकाश डालने में असमर्थ रह जाते।

 

3. प्राचीन भवन तथा स्मारक:- प्राचीन काल भारतीय इतिहास के निर्माण में प्राचीन भवनों तथा स्मारकों का विशेष महत्व है। इनसे अनेक ऐसे ऐतिहासिक तथ्य प्रकाश में आए हैं जो पहले अंधकार में थे। इनसे भारतीय इतिहास का रुप ही बदल गया है। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा आदि की खुदाई से हमें सिंधु घाटी सभ्यता के संबंध में ज्ञान प्राप्त हुआ है। इससे यह सिद्ध हुआ है कि आर्यों से पहले भारत में एक शानदार सभ्यता विकसित थी। इसी प्रकार पाटलिपुत्र के खंडहरों से, मौर्य वंश में तक्षशिला के खंडहरों से उसे हमें कुषाण वंश के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है।

प्राचीन इतिहास के स्त्रोत
प्राचीन इतिहास के स्त्रोत

निष्कर्ष:- ऊपर दिए गए स्त्रोतो के आधार पर प्राचीन काल भारतीय इतिहास की रूपरेखा को प्रस्तुत करने का विद्वानों द्वारा सफल प्रयास किया गया है। इसके बावजूद हमें यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि उपलब्ध स्त्रोत केवल भारतीय सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं। जबकि राजनीतिक इतिहास के अनेक पक्ष आज भी धुंधले हैं।

 

उदाहरण के तौर पर अशोक के आरंभिक जीवन, हर्षवर्धन की विजय, कनिष्क के राज्यरोहन की तिथि तथा गुप्त वंश की उत्पत्ति इत्यादि के बारे में विद्वानों में बहुत मतभेद है। यह आशा की जाती है कि इस क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न विद्वान अपने अथक प्रयासों से शीघ्र ही भारतीय इतिहास के इन धुंधले पक्षों पर प्रकाश डालने में सफल होंगे। इससे भारतीय इतिहास का वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया जा सकेगा निसंदेह हमारे लिए एक गर्व की बात होगी।

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