आर्य कौन थे? आर्य कहां के रहने वाले थे? आर्यों की पूरी जानकारी।

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आर्य कौन थे?आर्यों का मूल निवास स्थान कौन सा था?आर्य भारत में कब और किस प्रकार से आए? तथा उन्होंने भारत में किस प्रकार अपना प्रसार किया? आर्यों ने भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को कौन सी ऐसी बहुमूल्य चीज दी? जिस पर भारतीयों को आज भी बहुत गर्व है।यदि आप इन सभी सवालों के सही जवाब जानना चाहते हो, तो इस लेख को आखिर तक पढ़ते रहिएं।

आर्य कौन थे?
आर्य कौन थे?

आर्यों का परिचय

आर्य लगभग 1500 ईसा पूर्व मध्य एशिया से अफगानिस्तान के मार्ग से भारत आए थे। उन्होंने भारत में एक बड़ी उच्च कोटि की सभ्यता स्थापित की थी। उनके शासक प्रजा की इच्छा अनुसार शासन करते थे। समाज में महिलाओं का बहुत सम्मान किया जाता था, उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे। समाज में वर्ण विभाजन व्यवसाय के आधार पर किया गया था, न कि जाति-पाति के आधार पर।

लोग बहुत सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करते थे। यह प्राकृतिक शक्तियों को देवता मानकर उनकी पूजा करते थे। वरुण तथा इंद्र उनके मुख्य देवता थे। वे अपने देवी देवताओं को खुश करने के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञ करते थे। उनका आर्थिक जीवन भी सम्रद्ध था। कृषि तथा पशुपालन उनके मुख्य व्यवसाय थे। व्यापार वस्तुओं के विनिमय के रूप में होता था।

आर्य कौन थे?
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उत्तर वैदिक काल में आर्यों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक जीवन में बहुत से परिवर्तन हुए। आर्यों ने वैदिक साहित्य की रचना कर के समस्त मानव जाति को एक मूल्यवान देन दी। यदि भारतीय लोग वैदिक काल के आर्यों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को पूरी तरह अपना लें तो भारत सचमुच ही धरती पर स्वर्ग बन जाए।

आर्य कौन थे?

आर्यों की गणना संसार की सबसे सभ्य जाति में की जाती है। आर्य शब्द का अर्थ है- श्रेष्ठ। आर्य लंबे कद, गोरे रंग, हष्ट पुष्ट शरीर वाले और बहुत वीर होते थे। हजारों वर्ष पूर्व अपना निवास स्थान छोड़कर संसार के विभिन्न भागों में चले गए थे‌।उन्होंने इन देशों की सभ्यता तथा संस्कृति को बहुत प्रभावित किया। आज भी यूरोप तथा एशिया के बहुत से लोग समय को आर्य कहलाने में गर्व का अनुभव करते हैं।




आर्यों का मूल निवास स्थान

आर्यों का मूल निवास कौन-सा था? इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में प्रचलित मुख्य सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है।

1. सप्त सिन्धु सिद्धांत:- डाक्टर ए० सी० दास ने अपनी पुस्तक “ऋग्वैदिक भारत” तथा डॉक्टर संपूर्णानंद ने अपनी पुस्तक “आर्यों का आदि देश” में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्य सप्त सिन्धु प्रदेश (पंजाब तथा उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत, कश्मीर, काबुल तथा कंधार) के मूल निवासी थे। उन्होंने अपने मत के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किए हैं।

(i) ऋग्वैदिक में केवल सप्त सिन्धु प्रदेशों का वर्णन मिलता है। यदि आर्य बाहर से आए होते तो ऋग्वैदिक में इसका उल्लेख अवश्य किया जाता।

(ii) ऋग्वैदिक में 7 नदियों के नामों का वर्णन आता है वे सप्त सिंधु प्रदेश में हजारों वर्षों से बह रही है।

(iii) ऋग्वैदिक में जिन वृक्षों, पशुओं तथा पक्षियों का उल्लेख आता है, वे सभी सप्त सिन्धु प्रदेश में मिलते हैं‌।

(iv) ऋग्वेदिक में इस बात का वर्णन आता है कि आर्यों का मुख्य भोजन गेहूं, जौं तथा चावल आदि थे। यह सभी सप्तसिंधु प्रदेश में काफी मात्रा में उत्पन्न होते थे।

(v) ऋग्वैदिक में इस बात का कहीं कोई संकेत नहीं मिलता कि आर्यों के पूर्वज सप्तसिंधु प्रदेश के अतिरिक्त किसी अन्य प्रदेश में बसते थे।

कुछ इतिहासकार सप्त सिन्धु सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि

(i) यदि आर्य सप्तसिंधु प्रदेश के निवासी थे तो उन्हें ऐसे उपजाऊ प्रदेश को छोड़कर जाने की क्या आवश्यकता थी?

(ii) ऋग्वैदिक में आर्य तथा दासों के मध्य हुए लड़ाइयों से ज्ञात होता है कि आर्य विदेश से भारत आए थे।

(iii) ऋग्वैदिक में कुछ ऐसे भौगोलिक भागों तथा वृक्षों आदि का उल्लेख मिलता है जो कि सप्त सिन्धु प्रदेश में नहीं होते थे। इन बातों से स्पष्ट है कि आर्य विदेश से भारत आए थे।

2. उत्तरी ध्रुवी सिद्धांत:- भारत के प्रसिद्ध विद्वान बाल गंगाधर तिलक ने अपनी विख्यात पुस्तकें “आर्कटिक होम इन दी वेदांत” में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्य उत्तरी ध्रुव प्रदेश के रहने वाले थे। उन्होंने ऋग्वेद तथा जेंद अवेस्ता का गहन अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि इनमें जो प्राकृतिक दृश्य का वर्णन किया गया है वे सब उन दिनों उत्तरी ध्रुव में मिलते थे। ऋग्वेद में इस बात का उल्लेख मिलता है कि आर्यों के आदि स्थान पर बहुत शीत पड़ती थी। वहां 6 महीने का दिन तथा 6 महीने की रात होती थी। ऐसा केवल उत्तरी ध्रुव प्रदेश में ही संभव था।

आर्य कौन थे?
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भू वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि आदि काल में यहां का मौसम बहुत सुहावना होता था तथा यहां रहना दुष्कर नहीं था। धीरे-धीरे भौगोलिक परिवर्तनों के कारण जब यह क्षेत्र ठंडा होने लगा तो आर्यों ने इसे छोड़ दिया। कुछ अन्य यूरोपीय देशों में चले गए तथा कुछ भारत में आ बसे।

परंतु कुछ इतिहासकार तिलक के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि ऋग्वेद में कहीं भी उत्तरी ध्रुव प्रदेश तथा आर्यों का बाहर से भारत आकर बसने का संकेत नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में जिस ऊषा का वर्णन किया गया है। वह उत्तरी ध्रुव प्रदेश की ऊषा नहीं हो सकती। इसका कारण यह है कि ऋग्वेद के एक मंत्र में इस ऊषा के पूर्व में उदय होने की बात कही गई है जबकि अन्य मंतर में पश्चिम में। उत्तरी ध्रुव प्रदेश में ऊषा दक्षिण से उदय होती है।

3. तिब्बत का सिद्धांत:- आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में आर्यों का मूल निवास स्थान तिब्बत बताया है। उनके अनुसार ये लोग सूर्य तथा अग्नि के उपासक थे क्योंकि वे ठंडे देश के निवासी थे। यह ठंडा प्रदेश तिब्बत ही हो सकता है। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में जिन वृक्षों तथा पशु पक्षियों का उल्लेख किया गया है वे सभी उस समय तिब्बत में उपलब्ध थे। धीरे-धीरे उनकी जनसंख्या बढ़ गई तो उनका इस छोटे से देश में निर्वाह करना कठिन हो गया अपने पड़ोसी देश में जा बसे। यहां की जलवायु तथा भूमि उनके अनुकूल थी।

डॉक्टर संपूर्णानंद ने इस सिद्धांत का खंडन किया है। वे लिखते हैं कि सूर्य तथा अग्नि की पूजा इस बात का प्रमाण नहीं है कि उनका देश शीत प्रधान हो। उत्तरी ध्रुव प्रदेश में यद्यपि अधिक शीत पड़ती है परंतु यहां के एस्कीमो अग्नि की पूजा नहीं करते। पीरु में यद्यपि ठंड नहीं होती फिर भी यहां के निवासी सूर्य की उपासना करते हैं। इसके अतिरिक्त तिब्बत की जनसंख्या मंगोल जाति के साथ संबंध रखती है न की आर्य जाति के साथ।

4. ऑस्ट्रिया हंगरी का सिद्धांत:- डाक्टर पी० गाइलस तथा मैकडोनाल ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है कि आर्यों का मूल निवास स्थान ऑस्ट्रिया हंगरी था। वे लिखते हैं कि इन प्रदेशों की भाषाओं का संस्कृत भाषा के साथ गहन संबंध था। दूसरा यहां के लोग गांव में रहते थे उनका मुख्य व्यवसाय कृषि तथा पशुपालन था। वे गाय, बैल, कुत्ता, सूअर तथा घोड़ा आदि जानवरों से परिचित थे, जबकि हाथी तथा शेर के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। उन्हें समुंदर के बारे में कोई ज्ञान नहीं था।

आर्य कौन थे?
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उन्हें बलूत तथा बैंत वृक्षों की अच्छी जानकारी थी। यह सब विशेषताएं ऋग्वेद में दिए गए आर्यों के जीवन की विशेषताओं से पूरी तरीके से मिलती है। इनके अतिरिक्त यहां के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन ऋग्वेद में दिए गए वर्णन से मिलता है। यहां से आर्य मध्य एशिया तथा भारत की ओर चले गए।

आधुनिक विद्वान इस सिद्धांत को इतना महत्व नहीं देते। उनका कहना है कि ऋग्वेद में यह निश्चयात्मक ढंग से नहीं कहा जा सकता कि संपूर्ण विश्व में केवल ऑस्ट्रिया हंगरी ही ऐसा देश पर देश है जिसमें आर्यों का आदि देश की विशेषताएं मौजूद हो।

5. मध्य एशिया का सिद्धांत:- जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक “भाषा विज्ञान पर भाषण” में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आर्यों के पूर्वज मध्य एशिया में रहते थे। यहां से वे संसार के अन्य भागों में गए संभव है कि जनसंख्या में वृद्धि और खाद्य पदार्थों के अभाव के कारण विभिन्न क्षेत्रों की खोज में निकल पड़े। आर्यों की जो शाखा भारत आई उसकी संतान भारतीय आर्य कहलाई।

अनेक इतिहासकार मद्धेशिया के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि ऋग्वेद में कहीं भी मध्य एशिया का संकेत नहीं है। यदि आर्य मध्य एशिया के मूल निवासी होते तो आज भी उनके वंशज मध्य एशिया में अवश्य होने चाहिए थे, पर ऐसा नहीं है।

6. कुछ अन्य सिद्धांत: ऊपर दिए गए सिद्धांतों की अतिरिक्त आर्यों के मूल निवास स्थान के बारे में कुछ अन्य सिद्धांत भी प्रचलित है। जर्मन विद्वान पैंकें ने आर्य जाति की विशेषताओं के आधार पर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि आर्यों का मूल निवास स्थान उत्तरी जर्मनी था। नैहरिंग ने यूक्रेन को आर्यों का मूल निवास स्थान माना है। कोईनो तथा कुछ अन्य विदेशी विद्वानों के अनुसार आर्य यूराल पर्वत के मैदानी क्षेत्रों के निवासी थे। पर इन सिद्धांतों को अधिकतर इतिहासकार मान्यता नहीं देते।




7. सर्वमान्य सिद्धांत:- आर्यों के मूल निवास स्थान के संबंध में प्रचलित सिद्धांतों का आलोचनात्मक अध्ययन करने के बाद अब हम प्रोफेसर मैक्समूलर के मध्य एशिया के सिद्धांत को सर्वमान्य मानते हैं। इस सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं।

(i) मध्य एशिया के लोग जिन देवी देवताओं की पूजा करते थे उनमें से अधिकांश देवी देवताओं की पूजा आर्य लोग भी करते थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्य लोग भारत में आगमन से पूर्व मध्य एशिया में ही रहते थे।

(ii) आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। इसका यह अर्थ है कि आर्य लोग भारत में आने से पूर्व भी पशु पालन के काम में लगे हुए होंगे। पशु चराने के लिए उपयुक्त स्थान मध्य एशिया की विशाल चरागाह हो सकती है। इससे स्पष्ट है कि आर्य लोग शुरुआत में मध्य एशिया में रहते होंगे। चारे की कमी के कारण वहां से अन्य देशों में चले गए होंगे।

(iii) आर्यों के वेदों तथा ईरानियों की प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तकें “जेंद अवेस्ता” पढ़ने से ज्ञात होता है कि दोनों के पूर्वज इकट्ठे रहते थे। शायद यह देश मध्य एशिया ही होगा।

(iv) जिस भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक दृश्यों तथा पशु पक्षियों का वर्णन आर्यों के ग्रंथों में आता है वह सब मध्य एशिया में मिलते हैं इसलिए उनका मूल स्थान मध्य एशिया ही था।

(v) आर्यों के ग्रंथों में से पता चलता है कि आर्य शुरुआत में समुंदर से परिचित नहीं थे। मध्य एशिया ही केवल एक ऐसा स्थान है जो समुंदर से काफी दूर हैं।

(vi) अधिकांश इतिहासकार मध्य एशिया के सिद्धांत से सहमत है।

आर्यों का भारत में आगमन तथा प्रसार।

आर्य भारत में कब और किस प्रकार आए इस संबंध में इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं। बाल गंगाधर तिलक के अनुसार आर्य भारत में 6000 ईसा पूर्व में आए। जैकोबी ने इसका समय 5000 ईसा पूर्व निश्चित किया है। मैक्समूलर के अनुसार आर्य भारत में 1200 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के मध्य आए। अधिकांश आधुनिक इतिहासकार आर्यों के भारत आगमन के समय को 1500 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के मध्य मानते हैं। ऋग्वेद में जिन नदियों तथा प्रवृत्तियों का उल्लेख मिलता है, उनसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आर्यों ने भारत में अफगानिस्तान की ओर से प्रवेश किया। वे इकट्ठे एक बार नहीं आए, अपितु कई समूह में निरंतर अनेक वर्षों तक आते रहे।

आर्य कौन थे?
आर्य कौन थे?

भारत में प्रवेश करने के बाद आर्यों ने विभिन्न जनों (कबीलों) तथा आर्यों में काफी समय तक युद्ध होता रहा। भरत, पुरु, यदु, अनुश, तथा तुवर्षु आर्यों के उल्लेखनीय जन थे। ऋग्वेद में “दस राजाओं के युद्ध” का उल्लेख है। भारत वंश के शासक सुदास ने विश्वामित्र को अपना दरबारी पुरोहित नियुक्त किया था। उसने अनेक युद्ध को विजित करने में राजा सुदास की प्रशंसनीय सहायता की। बाद में राजा सुदास ने विश्वामित्र को हटाकर वशिष्ठ को पुरोहित के पद पर नियुक्त किया था। इस कारण दोनों पुरोहित एक दूसरे के प्रतिद्वंदी बन गए।

विश्वामित्र ने 10 राजाओं का संघ बनाकर राजा सुदास पर आक्रमण कर दिया। राजा सुदास ने इस संघ का पुरुष्णी (वर्तमान रावी)  नदी के तट पर सामना किया। इस युद्ध में सुदास की विजय हुई। इस महत्वपूर्ण विजय के कारण उनका सम्मान बहुत बढ़ गया।

आर्यों के भारत प्रसार में यहां के मूल निवासियों जिन्हे आर्य-अनार्य, दस्यु-दास, द्राविड़ तथा पणी आदि नामों से पुकारते थे के साथ अनेक युद्ध हुए। आर्यों के अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए। आर्य अपने बढ़िया शस्त्रो तथा तीव्र गति से चलने वालों रथों के कारण विजय रहे। इस प्रकार वे भारत में बस गए।

आर्य शुरुआत में सप्त सिन्धु प्रदेश में आकर बसे थे। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां सात नदिया सतलुज, व्यास, रावी, चिनाब, जेलम, सिंधु तथा सरस्वती बहती थी। आर्य सरस्वती नदी को सर्वाधिक पवित्र नदी समझते थे। अतः आर्यों ने इस नदी के तट पर ऋग्वेद के अनेक मंत्रों की रचना की थी। ऋग्वेद की रचना के कारण आर्यों ने सप्त सिन्धु प्रदेश का नाम ब्रह्माव्रत रख दिया। जनसंख्या के बढ़ने के कारण 9वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बाद गंगा के मैदान की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। उत्तर वैदिक काल में आर्यों का प्रसार हिमालय पर्वत से लेकर नर्मदा नदी तथा सिंधु नदी से लेकर बंगाल तक समस्त उतरी भारत में हो गया था।

वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य आर्यों की भारतीय संस्कृति और सभ्यता को सबसे बहुमूल्य देने थी। इसे अनमोल ज्ञान का भंडार माना जाता है। इसमें जीवन की आध्यात्मिक तथा अन्य समस्याओं के समाधान का वर्णन किया गया है। निसंदेह वैदिक साहित्य की रचना का मुख्य उद्देश्य धार्मिक था, किंतु यह वैदिक और उत्तर वैदिक काल के लोगों के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन पर भी पर्याप्त प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त यह प्राचीन कालीन भारतीय इतिहास की रचना के लिए हमारा एक मुख्य स्रोत है। यह संपूर्ण साहित्य संस्कृत भाषा में लिखा गया है।




आर्यों की देन

1. राजनीतिक देन:- राजनीतिक क्षेत्र में आर्यों की देन काफी महत्वपूर्ण थी। उन्होंने हमें लोकतंत्रीय ढंग से शासन करने की शिक्षा दी। आजकल हम देखते हैं कि संसार में जिस लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए सरकार तथा लोगों में संघर्ष चल रहा है, उस लोकतंत्र से आर्य हजारों साल पूर्व भली भांति परिचित थे। राजा का मुख्य उद्देश्य अपनी प्रजा का कल्याण करना था। वह अपनी प्रजा का पिता की भांति पालन करता था। यदि कोई राजा अत्याचारी प्रमाणित होता तो सभा तथा समिति नामक संस्था उसको शासन से उतार सकती थी। इस प्रकार यह दोनों संस्थाएं आज की संसद की भांति कार्य करती थी।

आर्य कौन थे?
आर्य कौन थे?

आर्य राजा सभी शक्तियां अपने अधिकार में नहीं रखते थे। वह स्थानीय शासन प्रबंध में विश्वास रखते थे। गांव में ग्रामीणी स्वतंत्र रूप से कार्य करता था। इस प्रकार का शासन प्रबंध अभी तक गांव में देखने को मिलता है। आर्यों ने अपनी युद्ध का आदर्श प्रस्तुत किया उन्होंने हमें बताया कि निहत्थे तथा सोए हुए शत्रुओं, स्त्रियों तथा बच्चों पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।

2. सामाजिक देन:- सामाजिक क्षेत्र में आर्यों की देन बहुत महत्वपूर्ण है। आर्यों का परिवार पिता प्रधान होता था। परिवार का सबसे वृद्ध पुरुष घर का मुखिया होता था। वह परिवार के सभी कार्यों की देखरेख करता था और परिवार के सभी सदस्य उसके आदेश का पालन करते थे। इस प्रकार आर्यों ने हमें बड़ों का सम्मान करना सिखाया।

आर्यों ने हमें संयुक्त परिवार में मिल जुलकर रहना भी सिखाया। यह संयुक्त परिवार प्रणाली अभी तक भारत में प्रचलित है। उन्होंने हमें स्त्रियों का सम्मान करने की शिक्षा दी‌। उन्होंने हमें बताया कि स्त्रियों को पुरुषों के समान समझना चाहिए और उन्हें अधिक से अधिक शिक्षा देनी चाहिए। आजकल की सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, सती प्रथा और पर्दा प्रथा आदि की कुप्रथाओं में उनका विश्वास नहीं था। उन्होंने अतिथियों का अधिक से अधिक सम्मान करना भी सिखाया।

3. धार्मिक देन:- आर्यों की धार्मिक क्षेत्र में देन प्रशंसनीय हैं। आर्यों का धर्म बड़ा सादा था और भी पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बल देते थे। आर्य यद्यपि अनेक देवी देवताओं की पूजा करते थे परंतु उन्हें एक परमात्मा का ही रूप समझते थे। देवताओं को खुश करने के लिए यज्ञ करवाए जाते थे। धार्मिक रीतियां घर के सबसे वृद्ध व्यक्ति द्वारा संपन्न की जाती थी। महिलाएं इन में बढ़-चढ़कर भाग लेती थी और उनके सहयोग के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा समझा जाता था।

आर्य कौन थे?
आर्य कौन थे?

आर्य गरीबों तथा दीन दुखियों की सेवा करना अपना परम कर्तव्य मानते थे। इस प्रकार आर्यों ने धर्म के संबंध में उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। आर्य लोग आवागमन मुक्ति तथा कर्म सिद्धांतों में विश्वास रखते थे‌। इन सिद्धांतों को आज भी हिंदू धर्म में प्रमुख स्थान प्राप्त है। आर्यों द्वारा पूजे जाने वाले देवी-देवताओं की पूजा आज भी भारतीय समाज में प्रचलित है।

4. सांस्कृतिक देन: संस्कृति क्षेत्र में आर्यों की देन सबसे महत्वपूर्ण हैं। उनके द्वारा रचित वैदिक साहित्य को ज्ञान का भंडार माना गया है। इन ग्रंथों में जीवन की समस्त समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है। आज भी इन ग्रंथों को बड़ी श्रद्धा से पढ़ा जाता है। आर्यों ने भारतीयों को संस्कृत भाषा दी, जो प्राचीन काल में शताब्दियों तक प्रचलित रही। आज भी हिंदू इस भाषा को पवित्र मानते हैं। इसने बाद में कई अन्य भारतीय भाषाओं को जन्म दिया यह सभी भाषाएं आज भी प्रचलित है।

5. आर्थिक देन:- आर्य लोगों की आर्थिक क्षेत्र में देन बड़ी महत्वपूर्ण प्रमाणित हुई। उन्होंने वनों को साफ करके विशाल क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लिया। अच्छी कृषि के कारण व्यापार भी काफी विकसित हुआ। परिणामस्वरुप भारत में कई शक्तिशाली राज्य अस्तित्व में आए जो शताब्दियों तक स्थापित रहे। आर्यों ने हमें बताया कि भूमि का विभाजन इस ढंग से होना चाहिए ताकि अमीरों तथा गरीबों में कोई अंतर नहीं रहे। उन्होंने हमें गांव में साझें हितों को सामने देखकर शामलाट भूमि रखने की जानकारी दी। आर्यों के समय में प्रचलित व्यवसाय जैसे कृषि, पशुपालन, व्यापार, वस्त्र तैयार करना और आभूषण तैयार करना आज भी प्रचलित है।

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